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________________ ५०२ / गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ४१६ बही उस विवक्षित भेद का गुणकार होता है। जैसे छठे स्थान का संकलित धन २१ है तो २१ बार आवली के असंख्यातवें भागों को रखकर परस्पर गुणित करने पर जो गुणनफल आवे वह छठे स्थान का गुणकार हुआ। इसी तरह अन्य स्थानों के भी गुणकार निकाल लेने चाहिए। फिर प्राप्त अपनेअपने गुणकारों से देशावधि के उत्कृष्ट क्षेत्र लोक को गुणा करने पर जो प्रमाण यावे यह परमावधि के उस नम्बर के भेद का क्षेत्र प्रसारण होगा | तथा उसी गुरणकार से देणावधि के उत्कृष्ट काल ( एक समय कम पल्य) को गुणित करने पर परमावधि के उस विवक्षित भेद के काल का प्रमाण आता है। जैसे छठे स्थान का संकलित धन = २१ है । अतः इक्कीस बार बावली के असंख्यातवें भागों की रखकर परस्पर गुणित करने पर जो गुणनफल आवे उससे लोक को गुणित करने पर तो परमावधि के छठे भेद का क्षेत्रप्रमाण आएगा । तथा यदि उसी विवक्षित गुणनफल को १ कम पल्य से गुणा करें तो परमावधि के छठे भेद का काल प्रमाणा होगा | धवला में परमावधि के उत्कृष्ट क्षेत्र का गुणकार उत्पन्न करके बताया है कि:तेजस्कायिक जीवों के अवगाहना-स्थानों से गुपित तेजस्कायिक जीवों की राशि को गच्छ करके क्योंकि इतने ही परमावधि के भेद हैं, एक-एक को आदि लेकर एक-एक अधिक संकलन के [ जैसे-प्रथम स्थान १, दि. १ + २ = ३, तू. १+२+३=६, चतुर्थस्थान १+२+३+४ = १० श्रथवा ४५५ = १० अथवा एक कम चार अर्थात् ३ की संकलना ६+४= १० इत्यादि ] लाने पर २ तेजस्कायिकराशि के वर्ग को लांघ कर उससे उपरिम वर्ग के नीचे यह राशि उत्पन्न होती है। इस शलाका संकलनराशि का विरलन करके प्रावली के असंख्यातवें भाग को प्रत्येक रूप के प्रति देकर परस्पर गुणित करके उससे देशावधि के उत्कृष्ट क्षेत्र घनलोक को गुणित करने पर परसावधि का उत्कृष्ट क्षेत्र होता है । ' प्रकारान्तर से उन्हीं गुणकारों की उत्पादनविधि यह है कि जैसे छठे भेद का संकलित धन लाना है तो ६ रख दो। फिर ६ से एक स्थान पूर्व अर्थात् ५ है, उस ५ का गच्छ धन १५ है अतः १५ में ६ को जोड़ दो तो २१ हुए । यही विवक्षित स्थान का संकलित धन होगा। इतनी आवली के असंख्यातवें भागों को रख कर परस्पर गुणित करने पर विवक्षित स्थान का गुणकार होता है । परमावहिवर होतेय हिदउक्कस्स प्रोहिणेत्तं तु । सव्वावहिगुणगारो काले वि श्रसंखलोगो दु ।।४१६ ।। गाथार्थ - उत्कृष्ट अवधिज्ञान के क्षेत्र में परमावधि के उत्कृष्ट क्षेत्र का भाग देने से जो लब्ध प्राप्त हो वह सर्वावधि क्षेत्र के लिए गुणकार है। तथा सर्वावधि काल का प्रमाण लाने के लिये असंख्यात लोक गुणकार है ||४१६|| विशेषार्थ परमावधि के क्षेत्र का, तेजस्कायिकों की कायस्थिति और अवधि निबद्ध क्षेत्र परस्पर गुणकार के वर्ग की अर्धच्छेद- शलाकाओं के ऊपर असंख्यात लोकमात्र वर्गस्थान जाकर १. घवल पु. ९ पृ. ४८-४६ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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