SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 511
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ माथा ३७७-३८३ ज्ञानमार्गणा/४७७ प्रमारण है उतना जघन्य अवविज्ञान का क्षेत्र है ॥३७८।। जघन्य अवधिज्ञान के क्षेत्र की ऊँचाई, लम्बाई और चौड़ाई के भिन्न-भिन्न प्रमाण का इस समय ज्ञान नहीं है किन्तु समीकरण करने पर जितना जघन्य अवगाहना का प्रमाण होता है उतना हो जघन्य अवधि का क्षेत्र है 11३७६।। जघन्य अवधिज्ञान के क्षेत्र का समीकरण करने पर उत्सेधांगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण अर्थात् सूच्वंगुल के असंख्यातवें भाग उत्सेध, विष्वम्भ पायामरूप घनप्रतर प्रमाण जघन्य अवधिज्ञान का क्षेत्र होता है ।। ३८०॥ जघन्य अवधिक्षेत्र का प्रमाण (माप) उत्सेधांगुल से है क्योंकि सूक्ष्म अवगाहना से ऊपर की अवगाहनायें प्रमाणांगुल से हैं ॥३८१|| जघन्य अवधिज्ञान के जघन्य अवधिक्षेत्र में जितने जघन्य द्रव्य समा जाते हैं, उन द्रव्यों की अवगाहना उत्सेधांगुल के असंख्यातवें भाग के धनपतरप्रमाण है ।।३८२।। जघन्य अवधिज्ञान प्रावली के असंख्यातवें भाग प्रमाण अतीत व अनागत काल को जानता है । भाव की अपेक्षा काल के असंख्यातवें भाग को जानता है ।।३८३।। विशेषार्थ-देशावधि तीन प्रकार है-जघन्य, उत्कृष्ट, अजघन्यानत्कृष्ट । जघन्य अवधि विषय की प्रमाणप्ररूपणा के बिना जघन्य देशावधि को प्रमाणप्ररूपणा का कोई उपाय है नहीं, अतः जघन्य विषय की प्ररूपणा के द्वारा जघन्य अवधि के प्रमाण की प्ररूपणा की जाती है। द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव के भेद से विषय चार प्रकार है। जघन्य द्रव्य का प्रमाण-कर्म से रहित ब अपने विस्रसोरचय सहित औदारिक शरीर नोकर्म द्रव्य में घनलोक का भाग देने पर एकभागप्रमाण जघन्य अवधि द्रव्य होता है । शङ्का-विस्रसोपचयसहित औदारिकशरीर जघन्य, उत्कृष्ट और तद्व्यतिरिक्त के भेद से तीन प्रकार है; उनमें से किसको घनलोक से भाजित किया जाता है ? समाधान-न तो जघन्य द्रव्य को और न उत्कृष्ट द्रव्य को घनलोक से भाजित किया जाता है, किन्तु जिन भगवान से देखा गया है स्वरूप जिसका ऐसा तद्व्यतिरिक्त द्रव्य घनलोक से भाजित किया जाता है। कारण कि क्षपित व गुणित विशेषण से विशिष्ट द्रव्य के निर्देश का अभाव है। संख्या में ही यह नियम है ऐसा प्रत्यवस्थान (समाधान) करना भी उचित नहीं है, क्योंकि यहाँ भी संख्या का अधिकार है। शङ्का-जघन्य अवधिज्ञान क्या इसी द्रव्य को जानता है अथवा अन्य को भी? यदि इसे ही जानता है तो अपने अवधिक्षेत्र के भीतर स्थित जघन्यद्रव्य स्कन्ध से एक परमाण अधिक, दो परमाण अधिक इत्यादि ऋम से स्थित स्कन्धों के ग्रहण का प्रभाव हो जाएगा। किन्तु ऐसा है नहीं, क्योंकि अपने क्षेत्र के भीतर स्थित अनन्त भेदों से भिन्न स्कन्धों के ग्रहण न होने का विरोध है और यदि | अपने अवधिक्षेत्र के भीतर स्थित जघन्य द्रव्य से परमाणु अधिक स्कन्धों को भी वह जानता है तो यही जघन्य अवधि-द्रव्य न होगा, क्योंकि अन्य भी जघन्य अवधिद्रव्य देखे जाते हैं ? समाधान- जघन्य अवधि द्रव्य एक प्रकार है ऐसा नहीं कहा गया है, किन्तु वह अनन्त विकल्प रूप है । उन अनन्त विकल्प रूप जघन्य अवधिज्ञान विषयक स्कन्धों में से यह गाथोक्त स्कन्ध अतिजघन्य कहा गया है। इस स्कन्ध से एक. दो तीन ग्रादि परमाणुओं से न्यून स्कन्ध जघन्य १. ध.पु. ६ पृ. १४-१५ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy