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________________ गाथा ३७२ ज्ञानमार्गणा/४७१ लक्षण पाया जाता है । एकक्षेत्र अवधिज्ञान की अपेक्षा शरीरप्रदेश अनेक संस्थान संस्थित होते हैं ।।५७॥ जिस प्रकार शरीरो का और इन्द्रियों का प्रतिनियत प्राकार होता है, उस प्रकार अवधिज्ञान के कररण अर्थात् उत्पत्ति चिह्न रूप शरीरप्रदेशों का नहीं होता, किन्तु अवधिज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम को प्राप्त हुए जीवप्रदेशों के करणरूप शरीरप्रदेश अनेक संस्थानों से संस्थित होते हैं। अर्थात् अनेक आकार के होते हैं। गा. २०१ में पृथिवीकाय आदि के शरीरों के प्राकार और गा. १७१ में इन्द्रियों के प्रतिनियत प्राकारों का कथन हो चुका है। अवविज्ञान के करणरूप अर्थात् उत्पत्ति-स्थान स्वरूप शरीरप्रदेशों का प्राकार श्रीवत्स, कलश, शेख, साथिया और नन्दावर्त आदि होते हैं ।।५८||' यहाँ आदि शब्द से अन्य भी शुभ संस्थानों का ग्रहण करना चाहिए। एक जीव के एक ही स्थान में अवधिज्ञान का करण होता है, ऐसा कोई नियम नहीं है, क्योंकि किसी भी जीव के एक, दो, तीन, चार, पांच और छह आदि क्षेत्ररूप शंखादि शुभ संस्थान सम्भब हैं। ये संस्थान तिर्यंचों और मनुष्यों के नाभि के उपरिम भाग में होते हैं, नीचे के भाग में नहीं होते, क्योंकि शुभ संस्थानों का अधोभाग के साथ विरोध है। तथा तिन और मनुष्य विभंगानियों के नाभि से नीचे गिरगिट आदि अशुभ संस्थान होते हैं, ऐसा गुरु का उपदेश है, इस विषय में कोई सूत्रवचन नहीं है। विभंगज्ञानियों के कालान्तर में सम्यक्त्व प्रादि को उत्पत्ति के फलस्वरूप अवधिज्ञान के उत्पन्न होने पर गिरगिट आदि अशुभ प्राकार मिटकर नाभि के ऊपर शस्त्र आदि शुभ प्राकार हो जाते हैं, ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए। कितने ही प्राचार्य अवधिज्ञान और विभंगज्ञान का क्षेत्र संस्थान-भेद तथा नाभि के नीचे. ऊपर का नियम नहीं है, ऐसा कहते हैं, क्योंकि अवधिज्ञानसामान्य की अपेक्षा दोनों में कोई भेद नहीं है। सम्यक्त्व और मिथ्यात्व की संगति से किये गये नाम-भेद के होने पर भी अबधिज्ञान की अपेक्षा उनमें कोई भेद नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर अतिप्रसंग दोष पाता है। इसी अर्थ को यहाँ प्रधान करना चाहिए। अवधिज्ञान के भेद गुणपच्चइगो छद्धा, अणुगावट्ठिदपबड्डमारिणदरा । देसोही परमोही सम्वोहित्ति य तिघा ओही ॥३७२॥ गाथार्थ-गुणप्रत्यय अवधिज्ञान छह प्रकार का है, अनुगामी, अवस्थित, वर्धमान ये तीन और तीन इनके इतर अर्थात् उलटे देशावधि, परमावधि और सर्वावधि के भेद से अवधिज्ञान तीन प्रकार का है ।।३७२।। विशेषार्थ-- वह अवधिज्ञान अनेक प्रकार का होता है - देशावधि, परमावधि, सविधि, १. विवक्षित प्रकरण में राजवातिककार ने ऐसा कहा है कि करणों के प्राधीन प्रवधिज्ञानोपयोग होने पर भी प्रवधिज्ञान पराश्रीन या परोक्ष नहीं कहा जा सकता ! यतः इन्द्रियों में ही "पर" शब्द देखा जाता है। अर्थात इन्द्रियों को ही पर कहा गया है। करणों (चिह्नों) को नहीं । रा.वा. १/२२/४/३ । २. "खेसदो ताव प्रवेबसंडारण संउिदा ॥५७." [ध.पु. १३ पृ. २६६] 1 ३. "सिरिबन्छ-कलप-संज-सोस्थिय-गांदावतादीरिण संठागाणि रणादम्बारिण भवति ॥५८।।" [.पु. १३ पृ. २६५] : ४. ध.पु. १३ पृ. २६७-६८ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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