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गाथा ३७१
ज्ञानमार्गणा ४६६ होकर उसके गुणप्रत्ययपने का प्रसंग प्राता है। पर इसका यह भी अर्थ नहीं है कि देवों और नारकियों के अपर्याप्त अवस्था में अवधिज्ञान का अत्यन्त प्रभाव है, क्योंकि तिर्यंचों और मनुष्यों में सम्यवत्व गुण के निमित्त से उत्पन्न हुया अवधिज्ञान देव और नारकियों के अपर्याप्त अवस्था में भी पाया जाता है। विभंग में भी यह अम्म लागू हो जाएगा, यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि अवधिज्ञान के कारणभूत अनुकम्पादि का अभाव होने से [देवों में] अपर्याप्त अवस्था में उसका अवस्थान नहीं रहता।
जो गुरणप्रत्यय अवधिज्ञान है, वह तिर्यचों और मनुष्यों के होता है ।२ क्योंकि तियंच और मनुष्य भवों को छोड़कर अन्यत्र अणुवत और महाव्रत नहीं पाये जाते ।
शङ्का-देव और नारक सम्बन्धी असंयत सम्यग्दृष्टि जीवों में अवधिज्ञान का सद्भाव भले ही रहा आवे, क्योंकि उनके अवधिज्ञान भयनिमित्तक होते हैं। उसी प्रकार देशविरति आदि ऊपर के गुणस्थानों में भी अवधिज्ञान रहा अावे, क्योंकि अवधिज्ञान की उत्पत्ति के कारणभूत गुणों का वहाँ पर सद्भाव पाया जाता है। परन्तु असंयत सम्यग्दृष्टिमनुष्य व तिर्यंचों में उसका सद्भाव नहीं पाया जाता, क्योंकि अवधिज्ञान की उत्पत्ति के कारणभूत भव और गुण असंयत सम्यग्दृष्टि तिर्यच व मनुष्यों में नहीं पाये जाते?
समाधान नहीं, क्योंकि अबधिज्ञान की उत्पत्ति के कारणरूप सम्यग्दर्शन का असंयत सम्यग्दृष्टि तिर्मय और मनुष्यों में मायाव नाम मात्रा है।
शङ्का-चूंकि सम्पूर्ण सम्यग्दृष्टियों में अवधिज्ञान की अनुत्पत्ति अन्यथा बन नहीं सकती इससे ज्ञात होता है कि सम्यग्दर्शन अवधिज्ञान की उत्पत्ति का कारण नहीं है ।
प्रतिशत-यदि ऐसा है तो सम्पूर्ण संयतों में प्रवधिज्ञान की अनुत्पत्ति अन्यथा वन नहीं सकती, इसलिए संयम भी अवधिज्ञान की उत्पत्ति का कारण नहीं है, ऐसा क्यों न मान लिया जाये ?
प्रतिशङ्का का उत्तर-विशिष्ट संयम ही अवविज्ञान की उत्पत्ति का कारण है, इसलिए समस्त संयतों के अवधिज्ञान नहीं होता।'
शङ्का का समाधान । यदि ऐसा है तो यहाँ पर भी यही मान लेना चाहिए कि असंयत सम्यग्दृष्टि तिर्यंच और मनुष्यों में भी विशिष्ट सम्यक्त्व ही अवधिज्ञान की उत्पत्ति का कारण है, इसलिए सभी सम्यग्दृष्टि तिबंच और मनुष्यों में अवधिज्ञान नहीं होता है, किन्तु कुछ के ही होता है, ऐसा मान लेने में क्या विरोध पाता है ? अर्थात् कुछ भी विरोध नहीं पाता।
शा- प्रौपथमिक, क्षाथिक और क्षायोपशमिक; इन तीनों ही प्रकार के विशेष सम्यग्दर्शनों में अवधिज्ञान की उत्पत्ति में व्यभिचार देखा जाता है। इसलिए सम्यग्दर्शन विशेष अवधिज्ञान की उत्पत्ति का कारण है, यह नहीं कहा जा सयाता है।
१. बबल पु. १३ पृ. १६१। २. "जं तं मुरणपन्चइयं त तिरिकात्र गणुस्साणं ॥५५।।" [धवल पु. १३ पृ. २६२) । ३. धवल पु.१ पृ. ३६५ ।