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ज्ञानमार्गा/४६७
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शङ्का - अवधिज्ञान अनन्त व्यंजन पर्यायों को नहीं ग्रहण करता है, इसलिए वह वस्तु एकदेश को जानने वाला है ।
गाथा ३७९
समाधान नहीं, क्योंकि व्यवहारनय के योग्य व्यंजनपर्यायों की अपेक्षा यहाँ पर वस्तुत्व माना गया है ।
शंका - मतिज्ञान में भी यही क्रम क्यों न माना जाय ?
समाधान — नहीं, क्योंकि मतिज्ञान के वर्तमान अशेष पर्याय विशिष्ट वस्तु के जानने का प्रभाव है, तथा मतिज्ञान के प्रत्यक्ष रूप से अर्थग्रहण करने के नियम का प्रभाव है।
वह अविज्ञान दो प्रकार का है- भवप्रत्यय अवधिज्ञान और गुणप्रत्यय अवधिज्ञान भव उत्पत्ति और प्रादुर्भाव ये पर्यायवाची नाम हैं। जिस अवधिज्ञान का प्रत्यय ( कारण ) भव है, वह भवप्रत्यय अवधिज्ञान है ।
शङ्का - यदि भव मात्र ही अवधिज्ञान का कारण है तो देव व नारकियों की उत्पत्ति के प्रथम समय में ही अवधिज्ञान क्यों नहीं उत्पन्न हो जाता ?
समाधान - यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि छह पर्याप्तियों से पर्याप्त भव को ही यहाँ अवधिज्ञान की उत्पत्ति का कारण माना गया है ।
सम्यक्त्व से अधिष्ठित अणुव्रत और महाव्रत गुण जिस अवधिज्ञान के कारण हैं, वह गुणप्रत्यय अवधिज्ञान है ।
शङ्का- यदि सम्यक्त्व, श्रणुव्रत और महाव्रत के निमित्त से अवधिज्ञान उत्पन्न होता है तो सब असंयत सम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और संयतों के अवधिज्ञान क्यों नहीं पाया जाता ?
समाधान- यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि सम्यक्त्व, संयमासंयम और संयम रूप परिणाम असंख्यात लोकप्रमाण हैं । उनमें से अवधिज्ञानावरण के क्षयोपशम के निमित्तभूत परिणाम अतिशय स्तोक हैं और वे सबके सम्भव नहीं हैं, क्योंकि उनके प्रतिपक्षभूत परिणाम बहुत हैं। इसलिए उनकी उपलब्धि क्वचित् ही होती है ।"
दोनों प्रकार के अवधिज्ञान के स्वामी
भइगो सुरगिरयाणं तित्थेवि सध्वअंगुत्थो । गुणपच्चइगो गर तिरियाणं संखादिचिभयो । ३७१||
गाथार्थ --: - भवप्रत्यय अवधिज्ञान देव और नारकियों के होता है तथा तीर्थंकरों के भी होता
२. "तं च योहिशाणं दुविहं भब पचचयं देव गुगपच्चइयं चैव ।। ५३ ।। " घवल पु.
१.
वल पु. ६ पृ. २७-२८ ।
१३ पृ. २६० । ३. धवल पु. १३ पृ. २६० । ४. ध. पु. १३ पृ. २११-२६२ ।