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________________ १६/ गो. स. जीवकाण्ड शङ्का – प्रत्याख्यानावरण कषायों की उदीरणा होने पर भी देशसंयम ( संयमासंयम ) को प्राप्ति होती है, अतः उनके सर्वघातीपना नहीं बनता अर्थात् सर्वघातीपना नष्ट होता है ? समाधान - ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि सकलसंयम का अवलम्बन लेकर उनके ( प्रत्याख्यानावरण कपाय के ) सर्वघानीपने का समर्थन किया है।" देश संयम (संगमा संयम ) की प्राप्ति मानने पर भी प्रत्याख्यानावरण कपाय का सर्वघातीपना नष्ट नहीं होता, क्योंकि प्रत्याख्यानावरकषाय अपने प्रतिपक्षी सर्वप्रत्याख्यानरूप संयमगुरण को घातता है. इसलिए वह सबंधाती है, किन्तु सर्व-अप्रत्याख्यान को नहीं घातता है, क्योंकि प्रत्याख्यानावरण का इस विषय में व्यापार नहीं है, अतः इस प्रकार से परिणत प्रत्याख्यानावरण कषाय के सर्वघाती संज्ञा सिद्ध है। जिस प्रकृति के उदय होने पर जो गुरण उत्पन्न होता हुआ देखा जाता है, उसकी अपेक्षा वह प्रकृति सर्वघाती संज्ञा को प्राप्त नहीं होती। यदि ऐसा न माना जावे तो प्रतिप्रसङ्ग दोष आ जावेगा । श्रप्रत्याख्यानावरण चतुष्क के सर्वघातीस्पर्धकों के उदयक्षय से, उन्हीं के सदवस्थारूप उपशम से, चारों सञ्ज्वलन और नव नोकषायों के सर्वघाती स्पर्धकों के उदयाभावी क्षय से, उन्हों के सदवस्थारूप उपशम से, देशघाती स्पर्धकों के उदय से एवं प्रत्याख्यानावरण कषाय चतुष्क के सर्वघाती स्पर्धकों के उदय से देशसंयम उत्पन्न होता है । अनन्तानुबन्धी आदि बारह कपायों के सर्वघाती स्पर्धकों उदयक्षय तथा उन्हीं के सदवस्थारूप उपणम से एवं देशघाती स्पर्धकों के उदय से प्रमत्त और अप्रमनगुणस्थान सम्बन्धी संयम उत्पन्न होता है, इसलिए उक्त तीनों ही भाव क्षायोपशमिक हैं, ऐसा कितने ही प्राचार्य कहते हैं, किन्तु उनका यह कहना युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि उदय के प्रभाव को उपशम कहते हैं' ऐसा अर्थ करके उदय से विरहित सर्वप्रकृतियों को तथा उन्हीं के स्थिति और अनुभाग सम्वन्धी स्पर्धकों को उपशम संज्ञा प्राप्त हो जाती है। अभी वर्तमान में क्षय नहीं है, क्योंकि जिस प्रकृति का उदय विद्यमान है. उसके क्षयसंज्ञा होने का विरोध है. इसलिए ये तीनों ही भाव उदयोपशमिकंपने को प्राप्त होते हैं, किन्तु ऐसा माना नहीं जा सकता, क्योंकि उक्त तीनों गुणस्थानों के उदयोपशमिकपना प्रतिपादन करने वाले सूत्र का प्रभाव है । फल देकर निर्जरा को प्राप्त कर्मस्कन्धों की क्षयसंज्ञा करके उक्तगुरणस्थानों को क्षायोपशमिक कहना भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा होने पर मिध्यादृष्टि आदि सभी भावों के क्षायोपशमिकता का प्रसंग आ जावेगा, अतः पूर्वोक्त अर्थ ही ग्रहरण करना चाहिए, क्योंकि वही निर्दोष है। यहाँ दर्शनमोहनीय की विवक्षा नहीं है, क्योंकि दर्शन मोहनीय कर्म के उपशमादिक से संयमसंयमादि भात्रों की उत्पत्ति नहीं होती है। उपणमश्रणी सम्बन्धी अपूर्वकरणादि चारों गुरणस्थानवर्ती जीवों के पशमिकभाव है, क्योंकि वे चारित्रमोहनीय कर्म की २१ प्रकृतियों का उपशमन करते हैं । शङ्का समस्त कषाय और नोकपायों के उपशम से उपशान्तकषाय वीतराग छद्मस्थ जीव केोपशमिकभाव भले ही हो, किन्तु पूर्वकरणादि शेष गुणस्थानवर्ती जोवों के प्रोपशमिकभाव नहीं मानना चाहिए, क्योंकि उन गुणस्थानों में समस्त मोहनीय कर्म के उपशम का प्रभाव है ? १. घ. पू. ११ पृ. ३७ । २. प. पु. ५. २०१ । ३. अ. पु. ५ पृ ९०२-२०३ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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