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________________ गाथा ३६७-३६८ ज्ञानमा ४५३ विधि, उनके नाम, संस्थान, उत्से, पांच महाकल्याणक, चौंतीस अतिशयों के स्वरूप और तीर्थकरों की वन्दना की सफलता का वर्णन करता है । ' शङ्का छह काय के जीवों की विराधना के कारणभूत श्रावकधर्म का उपदेश करने वाले होने से चौबीसों ही तीर्थंकर सावद्य सदोष हैं। दान, पूजा, शील और उपवास ये चार धावकों के धर्म हैं, यह चारों प्रकार का श्रावक धर्म छहकाय के जीवों की विराधना का कारण है, क्योंकि भोजन बनाना, दूसरों से बनवाना, अग्नि का जलाना, अग्नि का खुवना और खुबवाना आदि व्यापारों से होने वाली जीवविराधना के बिना दान नहीं हो सकता। उसी प्रकार वृक्ष का काटना और कटवाना, ईंट का गिरना और गिरवाना तथा उनको पकाना और पकवाना आदि छह काय के जीवों की विराधना के कारणभूत व्यापार के बिना जिनभवन का निर्माण करना अथवा करवाना नहीं बन सकता । तथा अभिषेक करना अवलेप करना, संमार्जन करना, चन्दन लगाना, फूल चढ़ाना और धूप का जलाना आदि जीववध के अविनाभावी व्यापारों के दिन पूजा कर नहीं सकता । अपनी स्त्री को पीड़ा दिये बिना शील का परिपालन नहीं हो सकता है। इसलिए शील की रक्षा भी सावध है । अपने पेट में स्थित प्राणियों को पीड़ा दिये बिना उपवास बन नहीं सकता । इसलिए उपवास भी सावध है । अथवा 'स्थावर जीवों को छोड़कर केवल त्रस जीवों को मत मारों श्रावकों को इस प्रकार का उपदेश देने से जिनदेव निरवद्य नहीं हो सकते । अथवा अनशन, अवमोदर्य, वृत्ति परिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन, वृक्ष के मूल में, सूर्य के आतप में और खुले हुए स्थानों में निवास करना, उत्कुटासन, पत्यंकासन, अर्धपत्यकासन, खड्गासन, गवासन, वीरासन, विनय, वैयावृत्य और ध्यान यादि क्लेशों में जीवों को डालकर उन्हें ठगने के कारण भी जिन निरवद्य नहीं हैं इसलिए वे वन्दनीय नहीं हैं । समाधान - यद्यपि तीर्थंकर पूर्वोक्त प्रकार का उपदेश देते हैं तो भी उनके कर्मबन्ध नहीं होता, क्योंकि जिनदेव के तेरहवें गुणस्थान में कर्मबन्ध के कारणभूत मिध्यात्व असंयम और कषाय का श्रभाव हो जाने से वेदनीयकर्म को छोड़कर शेष समस्त कर्मों का बन्ध नहीं होता । वेदनीय कर्म में भी स्थितिबन्ध व ग्रनुभागबन्ध नहीं होता, क्योंकि उनके कषाय का अभाव है। योग के कारण प्रकृतिबन्ध व प्रदेशबन्ध के अस्तित्व का भी कथन नहीं किया जा सकता, क्योंकि स्थितिबन्ध के बिना उदय रूप से आने वाले निषेकों में उपचार से अन्ध के व्यवहार का कथन किया गया है। साथ ही श्रसंख्यात गुणी श्रेणीरूप से वे प्रतिसमय पूर्वसंचित कर्मों की निर्जरा करते हैं, इसलिए उनके कर्मों का संचय नहीं बन सकता | तीर्थंकरों के मन वचन काय की प्रवृत्तियाँ इच्छापूर्वक नहीं होतीं जिससे उनके नवीन कर्मों का बन्ध होवे । जिस प्रकार सूर्य व कल्पवृक्ष की प्रवृत्तियाँ स्वाभाविक होती हैं उसी प्रकार उनके मन-वचन-काय की प्रवृत्तियाँ स्वाभाविक समझना चाहिए । तित्थयरस्स बिहारी लोप्रसुहो नेव तत्थ पुष्णफलो । च वाणपूजारंभयरं तं रंग वयणं १. धवल पु. १ पृ. ६६ । २. जयधवल पु. १ पृ. १००-१०१ । ४. जयधवस पु. १ पृ. १०५ । नवीन संस्करण पृ. ६६ । लेवेइ ॥ ५४॥ ३. जयबल पु. १ पृ. १०१-१०२ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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