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गाथा ३५२-३५४
ज्ञानमार्गणा / ४२६
वर्तमान काल में बहुत प्रक्षरों का एकअक्षरपना नहीं उपलब्ध होता है, ऐसा निश्चय करना भी युक्त नहीं है, क्योंकि वर्तमान काल में भी 'त्वक्म्य' इत्यादिक बहुत अक्षरों के एक अर्थ में विद्यमान होते हुए एकाक्षरता उपलब्ध होती है। स्वरों से अन्तरित न होकर एक अर्थ में विद्यमान व्यंजनों के ही एकअक्षरपना नहीं है, किन्तु स्वरों के द्वारा अन्तर को प्राप्त हुए बहुत व्यंजनों के भी एकाक्षरपना अविरुद्ध है, क्योंकि अत्यन्त भिन्न अक्षरों की एक अर्थ में वृत्ति होने की अपेक्षा उनमें कोई भेद नहीं है । '
प्रथम और द्वितीय अक्षरों के भंगों को एक साथ लाने के लिये प्रथम और द्वितीय ग्रक्षरों की संख्या का विरलन कर और उसको दूना कर परस्पर गुरणा करने से चार होते हैं (,, ) = ४ | फिर इसमें से एक अंक के घटा देने पर [ ( ४-१ ) तीन; ] प्रथम और द्वितीय अक्षरों के एक संयोग और द्विसंयोग रूप से तीन अक्षर होते हैं और श्रुतज्ञान के विकल्प भी उतने ही होते हैं। क्योंकि कारण का भेद कार्यभेद का अविनाभावी होता है । इसी कारण से विरलन कर और विरलित राशि प्रमाण दो अंकों को स्थापित कर परस्पर गुणा करके एक कम किया जाता है ।
तीसरे अक्षर के विवक्षित होने पर एकसंयोग से एकअक्षर होता है १ । प्रथम और तृतीय अक्षरों के द्विसंयोग से दूसरा भंग होता है २ । द्वितीय और तृतीय अक्षरों के द्विसंयोग से तीसरा भंग होता है ३ । प्रथम द्वितीय और तृतीय अक्षरों के त्रिसंयोग से चौथा भंग होता है ४ । इस प्रकार तृतीय अक्षर के एक दो और तीन संयोगों से चार भंग लब्ध होते हैं ४ । अव प्रथम और द्वितीय अक्षरों के भंगों के साथ तृतीय अक्षर के भंग लाना इष्ट है । इसलिए तीन अक्षरों का विरलन कर और तत्प्रमाण दो स्थापित कर परस्पर गुणा करने पर आठ भंग उत्पन्न होते हैं (, ८) इनमें से एक करने पर प्रथम, द्वितीय और तृतीय अक्षरों के सब मिलकर (८१) सात भंग होते हैं । जितने अक्षर होते हैं, उतने ही श्रुतज्ञान के विकल्प होते हैं, क्योंकि सर्वत्र कारण का अनुसरण करने वाले कार्य होते हैं । इसीलिए अन्योन्य गुरित राशि में से एक कम किया जाता है । "
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अब इनके उचारण का क्रम कहते हैं— प्रकार के एक्संयोग से एक अक्षर उपलब्ध होता है १ । आकार के भी एक संयोग से एक प्रक्षर विकल्प उपलब्ध होता है १ । आकार के भी एक संयोग से एक अक्षरविकल्प उपलब्ध होता है ? | इस प्रकार एक संयोगी अक्षर तीन होते हैं ३ । पुनः अकार और लाकार के द्विसंयोग से चौथा क्षरविकल्प होता है ४ । पुनः प्रकार और आकार के द्विसंयोग से पाँच अक्षरविकल्प होता है ५ । पुनः आकार और आकार के द्विसंयोग से छठा अक्षर विकल्प होता है ६ । पुनः प्रकार, आकार और आकार के त्रिसंयोग से सातवाँ अक्षरविकल्प होता है ७ । जितने अक्षर होते हैं उतने ही श्रुतज्ञान के विकल्प होते हैं, क्योंकि सर्वत्र कारण का अनुकरण करने वाले कार्य उपलब्ध होते हैं । इसलिए अन्योन्य गुणित राशि में से एक कम करते हैं । "
अव चतुर्थ अक्षर के विवक्षित होने पर एकसंयोग से एकभंग होता है १ । प्रथम और चतुर्थ के संयोग मे दुसरा अक्षर द्विसंयोगी होता है २ । द्वितीय और चतुर्थ अक्षरों के द्विसंयोग से तीसरा ग्रक्षर होता है ३ | तृतीय और चतुर्थ अक्षरों के द्विसंयोग से चौथा अक्षर होता है ४ । प्रथम द्वितीय और चतुर्थ अक्षरों के त्रिसंयोग से पाँचवाँ अक्षर होता है ५ । प्रथम तृतीय और चतुर्थ अक्षरों के
१. बबल पु. १३ पृ. २५० । २. धवल पु. १३ पृ. २५१-२५२ । ३. धवल पु. १२. २५२ ।