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________________ ४२८,गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ३५२-३५४ उसके लिए गणित गाथा-संयोगावरणों को लाने के लिये चौसठ संख्या प्रमाण दो राशि (दो का अङ्क) स्थापित करे। पश्चात् उनका परस्पर गुणा करके जो लब्ध अावे उसमें से एक कम करने पर कुल संयोग अक्षर होते हैं ।।४६।। अक्षरों की चौंसठ संख्या का विरलन करें। यहाँ चौंसठ अक्षरों की स्थापना इस प्रकार हैअ आ आ ३, इ ई ई ३, उ ऊ ऊ ३, ऋ ऋऋ३, ल ल ल'. ३, ए ए २ ए ३, ऐ ऐ २ ऐ ३, यो ओ २ प्रो ३, प्रौ औ २ औ ३, क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण, त थ द ध न प फ ब भ म, य र ल व श ष स ह क प अं अः। शङ्खा-- इन अक्षरों में के ख, ग ५ , इन पांच धारणाओं का क्यों नहीं ग्रहण किया ? समाधान नहीं, क्योंकि स्वररहित कवर्ग का अनुसरण करने वाले संयोग में उत्पन्न हुई धारणाओं का संयोगाक्षरों में अन्तर्भाव हो जाता है।' इन अक्षरों की संख्या राशि(६४)प्रमाण '२' अङ्क का बिरलन कर-जैसे २२२२२२२२ २२२२२२२२२२२२२२२२२२२२२२२२२२२२२२२२२२२२२ २ २२२२२२२२२२२२२२२२२२ परस्पर गुणा करने से १८४४६७४४०७३७०६५५१६१६ यह राशि प्राप्त होती है। इस संख्या में से एक कम करने पर संयोगी अक्षरों का प्रमाण प्राप्त होता है। चौंसठ अक्षरों की संख्या का विरलन कर और उसको द्विगुणित कर वर्गित-संवर्गित करने पर एकसंयोगी और द्विसंयोगी आदि श्रुतज्ञान के विकल्प कसे उत्पन्न होते हैं और उस उत्पन्न हुई राशि में से एक कम किसलिए किया जाता है, ऐसा पूछने पर कहते हैं-प्रथम अक्षर का एक ही भंग होता है, क्योंकि उसका शेष अक्षरों के साथ संयोग नहीं है। अागे दूसरे अक्षर की विवक्षा करने पर दो भंग होते हैं, क्योंकि स्वस्थान की अपेक्षा एकभंग, पहले व दूसरे अक्षर से दूसरा भंग; इस प्रकार दो ही भंग होते हैं। शङ्का–संयोग क्या है ? क्या दो अक्षरों को एकता संयोग है ? क्या उनका एक साथ उच्चारण करना संयोग है ? क्या उनकी एकार्थता (एकार्थबोधकाता) का नाम संयोग है ? समाधान-दो अक्षरों की एकता तो संयोग हो नहीं सकती, क्योंकि एकत्व भाव मानने पर द्वित्व का नाश हो जाने के कारण उनका संयोग होने में विरोध पाता है। सहोच्चारण का नाम भी संयोग नहीं है, क्योंकि चौसठ प्रक्षरों का एक साथ उच्चारण करना बनता नहीं है। इसलिए एकार्थता का नाम संयोग है, ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए। शशा-एक अर्थ में विद्यमान बहुत प्र.क्षरों की एक अक्षर संज्ञा कैसे हो सकती है ? समाधान ---यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि अर्थ के द्वारा उन सभी का एकत्व पाया जाता है। १. घवल पु. १३ पृ. २४६ । २. चवल पु. १३ पृ. २४६ । ३. धवल पु. १३ पृ. २५० ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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