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________________ गाथा ३२३-३३१ शानभाग/४११ वृद्धियाँ पायी जाती हैं तो एक अधिक काण्डक प्रमाण संख्यातभाग वृद्धियों के नीचे वे कितनी पायी जावेंगी। इस प्रकार प्रमाण से फलगुरिणत इच्छा को अपरिवर्तित करने पर काण्डकासहित काण्डकवर्गप्रमाण असंख्यात भाग वृद्धियाँ होती हैं ।' संख्यात भाग द्धियों का काण्डक वर्ग और एक काण्डक जाकर (१६+४) असंख्यात गुणवृद्धि का स्थान होता है ॥२२२।। एक संख्यात गुरग वृद्धि के नीचे संख्यात भाग वृद्धियाँ होती हैं तो एक अधिक काण्डक प्रमाण संख्यात गुणवृद्धियों के नीचे वे कितनी होंगी; इस प्रकार प्रमाण से फलगुरिणत इन्छा को अपर्तित करने पर काण्डक सहित काण्डकवर्गप्रमारग संख्यात भाग वृद्धियां होती संख्यातगुण वृद्धियों का काण्डक-वर्ग और एक काण्डक जाकर (१६+४) अनन्तगुणवृद्धि का स्थान होता है ।।२२३।। एक असंख्यातगुण वृद्धि के नीचे यदि काण्डक प्रमाण संख्यातगुणवृद्धियाँ होती है तो एक अधिक काण्डक प्रमाण असंख्यात गुणवृद्धियों के नीचे वे कितनी होंगी, इस प्रकार प्रमाण से फलगुणित इच्छा को अपवर्तित करने पर अष्टांक के नीचे काण्डक सहित काण्डका वर्ग प्रमाण संख्यातगुणवृद्धि स्थान होते हैं।' इस प्रकार एक षट्-स्थान-पतित के भीतर अनन्त भाग वृद्धियाँ पांच काण्डकों की अन्योन्याभ्यस्त राशि (४४४४४४४४४ अर्थात् ४४४२१०२४) व चार काण्डक वर्ग के वर्ग, तथा छह कापडकघन, व चार काण्डकवर्ग और एक काण्डक प्रमाण हैं। अंक संदृष्टि १०२४ + (२५६ + २५६ : २५६+२५६) + (६४ + ६४ + ६४+६४ + ६४ + ६४) + (१६+१६+ १६+१६+४ इतनी बार अनन्तभाग वृद्धि होती है। असंख्यातभागवृद्धियो एक काण्डकावर्ग संवर्ग व तीन काण्डकघन तथा तीन काण्डक वर्ग और एक काण्डक प्रमाण होती है २५६ + (६४+६४+६४) + (१६ +१६+ १६) +४। संख्यात भाग वृद्धियां काण्डक धन व दो काण्डक वर्ग और एक काण्डक प्रमाण होती हैं। ६४+ (१६ +१६) + ४। संख्यात गुणवद्धियो काण्डकवर्ग व काण्डकप्रमाण है-१६+४। असंख्यात गुणवद्धियाँ काण्डक प्रमाण -४ । अष्टांक एक है जो जघन्य स्थान है। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित सुत्र भी है-"अनन्तगुणवृद्धि के नीचे अनन्तभाग वृद्धियाँ-पांच बार गुरिणत काण्डक, चार काण्डकवर्गावर्ग, छह काण्डकघन, चार काण्डकवर्ग और काण्डक प्रमाण होती है । (४४४४४४४४४-१०२४) + (४ काण्डकवर्गावर्ग= ४४२५६) + (४३४६) + (४२४४) + ४ अथवा १०२४ + २५६ + २५६ + २५६ + २५६ ६४ + ६४ + ६४ + ६४ । ६४ |- ६४+१६ + १६+१६+१६+ ४ ॥२२॥ अनन्तगुणवृद्धि के नीचे असंख्यात भाग वृद्धियाँ एक काण्डकवर्गावर्ग, तीन काण्डकघन, तीन काण्डकवर्ग और एक काण्डक होती है ।।२२८।। [(४४४५) + (४३४३) + (४२४३)+ ४] अथवा [२५६+६४+६४ + ६४ -- १६ + १६ + १६ + ४] " अनन्तभाग वृद्धिस्थान के नीचे संख्यात भाग वृद्धियों का प्रमाण एक काण्डक घन, दो काण्डक वर्ग और एक काण्डक होता है [४३(४२४२)+४] २२६।। अथवा [६४ + १६ + १६ + ४] १. धवल पु. १२ पृ. १६७। २. पक्षल पु. १२ पृ. १६७-१६८। ३. घबल पु. १२ पृ. १६ । ४. धवल पु. १२ पृ. १६२-१३३ । ५. धवल पु. १२ पृ. २०१। ६. धवल पु. १२ पृ. २०१। ७. प.पु. १२ पृ. १६६ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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