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गाथा ३२३-३३१
जानमार्गगा/१०५
निगोदिया का ज्ञान क्षायोपशमिक ही है। यदि यात्मा के एकप्रदेश में भी केवलज्ञान के अंश रूप निराबरण ज्ञान होवे तो उस एकस देश से भी लोकालोक प्रत्यक्ष हो जावे, किन्तु वह निगोदिया फा नित्यउद्घाटित ज्ञान सबसे जघन्यज्ञान होने से सबसे थोड़ा जानता है, यह तात्पर्य है ।'
षट्स्यानवृद्धि का स्वरूप अवरुवरिस्मि अणंतमसंखं संखं च भागवड्ढीए । संखमसंखमणतं गुणवड्ढी होंति हु कमेण ॥३२३॥ जीवाणं च य रासो असंखलोगा बरं खु संखेज्ज । भागगुणम्हि य कमसो अवद्विदा होति छट्ठारणा ।।३२४॥ उन्त्रकं चउरकं पणछस्सत्तक अट्ठ-अंक च । छन्चड्ढीणं सर कमसो संविट्टिकरण? ॥३२५॥ अंगुलप्रसंखभागे पुब्बगवड्ढीगदे दु परवड्ढी । एक वारं होदि हु पुणो पुरणो चरिम उड्ढित्ती ॥३२६।। आदिमछट्ठारणम्हि य पंच य वड्ढी हवंति सेसेसु । छन्वड्ढीयो होति हु सरिसा सवत्थ पदसंखा ॥३२७॥ छठ्ठाणाणं प्रादी अट्ठक होदि चरिममुय्यक । जम्हा जहणणार अट्ठक होदि जिरग दिट्ठ ॥३२८।। एक्कं खलु अट्ठकं सत्तक कंडयं लदो हेट्ठा । रुवाहियकंडएण य गुरिषदकमा जावमुव्वकं ॥३२६।। सम्वसमासो रिणयमा रूवाहियकंडयस्स बग्गस्स । बिबस्स य संवग्गो होदित्ति जिणेहि रिणद्दिट्ट ॥३३०॥ उक्कस्ससंखमेतं तत्तिचउत्थेकदालछप्पण्णं ।
सत्तदसमं च भाग गंतूरणय लद्धिअक्खरं दुगुणं ॥३३॥ गाथार्थ - जघन्य के ऊपर क्रम से अनन्तभाग वृद्धि, असंख्यातभाग वृद्धि, संख्यातभागवृद्धि, संख्यातगुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि और अनन्तगुणवृद्धि होती है ।।३२३।। समस्त जोवराशि, असंख्यात लोकप्रमाण राशि, उत्कृष्ट संख्यात राशि ये तीन राशि, पूर्वोक्त अनन्तभागवृद्धि प्रादि छह
- - - १. वृहद दव्यसंग्रह गाथा ३ की संस्कृत टीका-- "यच्च लब्ध्यपर्याप्तसूक्ष्मनिगोदजीने निन्योवघाट निराबरणज्ञानं श्रयले तदपि सुक्ष्मनिगोमवंजघन्यक्षयोपशमापेक्षया निराबरगं, न च सर्वथा ।................किन्तु दितादित्यविम्बवत निविडलोचनपटलबद वा स्तोक प्रकाशयतीत्यर्थः ।" वृहदतव्यसंग्रह, श्री गणेश वर्णी दि. जैन ग्रंथमाला, पृ.६६-६७।