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________________ ४०४/गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ३१६-३२२ जोवराशि से अनन्तगुणे ज्ञानाविभागप्रतिछेद प्राप्त होते हैं। इस प्रक्षेप को लब्ध्यक्षर ज्ञान में मिला देने पर पर्यायज्ञान का प्रमाण उत्पन्न होता है (लब्ध्यक्षर ज्ञान में अनन्तवें भाग वृद्धि होने पर पर्यायज्ञान उत्पन्न होता है)। इस पर्यायज्ञान में सब जीवराशि का भाग देने पर, लब्ध को पर्यायज्ञान में मिला देने पर (अनन्तवें भागवृद्धि) पर्यायसमासज्ञान होता है । पुन: इसके प्रागे अनन्त भागवृद्धि, असंख्यात भागवृद्धि, संख्यात भागवृद्धि, संख्यात गुणवृद्धि, असंख्यात गुणवृद्धि और अनन्त गुणवृद्धि के क्रम से असंख्यातलोकमात्र पर्यायसमासज्ञान निरन्तर प्राप्त होते हैं, यहाँ पर मात्र लब्ध्यक्षरज्ञान को नित्य उद्घाटित निरावरण कहा गया है, पर्यायज्ञान को निरावरण नित्य उद्घाटित नहीं कहा गया है । पर्याय किसका नाम है ? ज्ञानाविभागप्रतिच्छेदों का नाम पर्याय है। उनका समास जिन ज्ञानरथानों में होता है, उन ज्ञानस्थानों की पर्यायसमास संज्ञा है, परन्तु जहाँ एक ही प्रक्षेप होता है, उस ज्ञान की पर्यायसंज्ञा है। दूसरा मत इस प्रकार है-क्षरण अर्थात् विनाश का अभाव होने में केवलज्ञान अक्षर है। उसका अनन्तवाँ भाग पर्याय नाम का मतिज्ञान है। वह पर्याय नाम का मतिज्ञान व केवलज्ञान निरावरण और अविनाशी हैं। इस सूक्ष्म-निगोद लब्धि-अक्षर से जो श्रुतज्ञान उत्पन्न होता है वह कार्य में कारण के उपचार से पर्याय कहलाता है। इस पर्याय श्रुतज्ञानसे जो अनन्तवें भाग अधिक श्रुतज्ञान होता है वह पर्यायसमासज्ञान कहलाता है। अनन्तभाग वृद्धि, असंहयातभागवृद्धि, संख्यात भाग वृद्धि, संख्यात गुणवृद्धि, असंख्यात गुणवृद्धि और अनन्त गुण वृद्धि इन छहों वृद्धियों के समुदायात्मक यह पइस्थान वृद्धि होती है ।। इस दूसरे मत में सर्वजघन्य मतिज्ञान को पर्याय संज्ञा है। वह मतिज्ञान सर्वजघन्य लब्ध्यक्षर श्रुतज्ञान को कारण है, अतः कार्य में कारग का उपचार करके उस श्रुतज्ञान (लब्ध्यक्षर श्रुतज्ञान) को भी पर्यायज्ञान कहा गया है। अर्थात् पर्याय नामक मतिज्ञान के समान पर्याय श्रुतज्ञान भी निराबरण नित्य उद्घाटित है। किन्तु पूर्वमत में लब्ध्यक्षर श्रुतज्ञान के ऊपर अनन्तभाग वृद्धि होने पर पर्याय ज्ञान की उत्पत्ति है। वहाँ पर लब्ध्यक्षर श्रुतज्ञान निरावरण नित्य-उद्घाटित कहा गया है, पर्यायज्ञान में एक प्रक्षेप की वृद्धि हो जाने से उसको नित्य-उद्घाटित निराबरण नहीं कहा गया है। इन दोनों मतों को दृष्टि में रखते हुए सम्भवत: उपयुक्त गाथाओं की रचना हुई है। इन दोनों मतों में से कौनसा मत ठीक है. यह कहीं नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वर्तमान में श्रुतकेवली का अभाव है। अत: दोनों मतों का संकलन कर दिया गया है। लब्ध्यपर्याप्तक सूक्ष्मनिगोद जीव में नित्य उद्घाटित तथा आवरणरहित ज्ञान कहा गया है, यह भी सूक्ष्म निगोद में ज्ञानावरण कर्म के सर्व जघन्य क्षयोपशम की अपेक्षा से ग्रावरण रहित है, किन्तु सर्वथा प्रावरणरहित नहीं है। यदि उस जघन्यज्ञान का भी प्रावरण हो जाए तो जीव का ही प्रभाव हो जाएगा। वास्तव में तो जपरिवर्ती क्षायोपशमिक ज्ञान की अपेक्षा और केवलज्ञान की अपेक्षा वह ज्ञान भी प्रावरणसहित है; क्योंकि संसारी जीवों के क्षायिकज्ञान का अभाव है, इसलिए १. ध.पु. १३ पृ. २६२-२६४ । २. घ.पु. १३ पृ. २६४ । २१-२२ । ३. धवल पु. १३ पृ. २६४ । ४, धवल पु. ६ पृ.
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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