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गाथा ३ १६
ज्ञानमार्गा/३६६
वरण के क्षयोपशम बहुधा भिन्न होते हैं, अतः उनके भेद से और बाह्य निमित्तों के भी भेद से श्रुत को होनाधिकता का सम्बन्ध होता है ।
शङ्का - जब आद्यश्रुतविषयता को प्राप्त हुए प्रविनाभावी वर्ण-पद-वाक्य आदि भेदों को धारण करने वाले शब्दपरिगत पुद्गलस्कन्ध से और चक्षु आदि के विषय से संकेतयुक्त पुरुष घट से जलधारणादि कार्यरूप अन्य सम्बन्धी को अथवा अग्नि भादि से भस्म आदि को जानता है तब श्रुत से श्रुत का लाभ होता है, श्रतः श्रुत का मतिपूर्वत्व लक्षण श्रव्याप्ति दोषयुक्त है
?
समाधान - ऐसा नहीं है, क्योंकि व्यवधान के होने पर भी पूर्व शब्द की प्रवृत्ति होती है। जैसे मथुरा से पूर्व में पाटलिपुत्र है । इसलिए मतिपूर्व-ग्रहण में सक्षात् मतिपूर्वक और परम्परा मतिपूर्वक भी ग्रहण किया जाता है ।"
श्रुतज्ञान के निमित्त से जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह भी श्रुतज्ञान ही है। फिर भी 'भतिज्ञानपूर्वक श्रुतज्ञान होता है' इस सूत्र के साथ विरोध नहीं प्राता, क्योंकि उक्त सूत्र श्रुतज्ञान की प्रारम्भिक प्रवृत्ति की अपेक्षा कहा गया है।
पूर्व निमित्त और कारण ये एकार्थवाची हैं ।
श्रुतज्ञान के भेद
लोगाराम संखमिदा प्रणवखरप्पे हवंति छट्टारणा । anagarपमा रुकरण भक्खरगं ।।३१६॥
गाथा - पदस्थानपतित वृद्धि की अपेक्षा अनक्षरात्मक श्रुतज्ञान के असंख्यात लोकप्रमाण भेद होते हैं । अक्षरात्मक श्रुतज्ञान का प्रमाण द्विरूप वर्गधारा में छठे वर्गस्थान एकट्ठी में से एक
वाम है ।। ३१६ ।।
विशेषार्थ - सूक्ष्म निगोद लब्ध्यपर्याप्तक के जो जघन्य ज्ञान होता है उसका नाम लब्ध्यक्षर है । शङ्का - इसकी अक्षर संज्ञा किस कारण से है ?
समाधान-नाश के बिना एक स्वरूप से अवस्थित रहने से केवलज्ञान प्रक्षर हैं। क्यों उसमें वृद्धि हानि नहीं होती । द्रव्याधिक नय की अपेक्षा सूक्ष्म निगोदलब्ध्यपर्याप्तक ज्ञान भी वही है, इसलिए इस ज्ञान को अक्षर कहते हैं ।
शङ्का - इसका प्रमारग क्या है ?
समाधान- इसका प्रमाण केवलज्ञान का अनन्तवाँ भाग है ।
यह ज्ञान निरावरण हैं, क्योंकि अक्षर का अनन्त भाग नित्य उद्घाटित रहता है अथवा
१. धवल पु. ६ पृ. १६० १६१ । २. धवल पु. १३ पु. २१० ।
३. सर्वार्थसिद्धि १/२०१