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गाथा २६९-२९७
कषायमार्गणा/३६६
शङ्का--शुक्ल लेश्या में स्थित जीव पद्म, तेज, कापोत और नील लेण्यानों को लांघकर कैसे एक साथ कृष्णलेश्या में परिणत हो सकता है ?
समाधान-मध्यम शुक्ल लेश्या वाला देव-प्राथु के क्षीण होने पर जघन्य शुक्ललेण्या प्रादि से परिणमन न कर शुभ तीन शेश्यालों में मिलता है।'
यद्यपि इन प्रशारणों में यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है तथापि इन प्रकरणों से यह निष्कर्ष निकलता है कि द्रहों लेण्याओं के कुछ मध्यम अंग परस्पर समान हैं।
इस विषय का किसी भी प्राचार्य ने उल्लेख नहीं किया है अतः यह विषय ग्राह्य नहीं है किन्तु विचारणीय है । विचारार्थ ही इस विषय को यहाँ पर लिखा गया है ।
कषायमार्गणा में जीवों की संख्या पुह पुह कसायकालो रिणरये अंतोमुहत्तपरिमारयो । लोहादी संखगुणो देवेसु य कोहपहुवीदो ॥२६॥ सम्वसमासेगवहिवसगसगरासी पुगोवि संगुरिणदे ।
सगसगगुरणगारेहि य सगसगरासीरणपरिमाणं ॥२६॥' माथार्थ-नारकियों में पृथक्-पृथक् कषाय का काल यद्यपि अन्तर्मुहूर्त है तथापि लोभादि कषायों का काल पूर्व पूर्व की अपेक्षा उत्तरोत्तर संख्यात गुणा है। इसी प्रकार देवों में क्रोधादि कषायों का काल पूर्व-पूर्व की अपेक्षा उत्तरोत्तर संख्यात गुणा है। समस्त कषायों के उदयकाल के जोह का--अपनी-अपनी गति सम्बन्धी जीवराशि में भाग देने से जो लब्ध प्राप्त हो उसको अपनीपानी गति सम्बन्धी विवक्षित कषाय के उदय काल से गुणा करने पर तत्तत् कषाय सम्बन्धी जीवराशि का प्रमाण प्राप्त होता है ।।२९६.२६७॥
विशेषार्य- क्रोध कषाय का काल, मान कषाय का काल, माया कषाय का काल और लोभ भाषाय का काल जघन्य भी और उत्कृष्ट भी अन्तमुहर्त है। नरक गति में लोभ का काल सबसे स्तोक है, उससे माया का काल संख्यात मुणा है, उससे मान का काल संख्यात गुणा है उससे क्रोध का काल संख्यातगुणा है, इसी प्रकार देवगति में भी जानना चाहिए, इतनी विशेषता है कि लोभ का काल संख्यातगुणा है, इस स्थान के प्राप्त होने तक विलोम क्रमसे जानना चाहिए। इस का स्पष्टीकरण इस प्रकार है
नरक गति में शोध मान पुनः क्रोत्र मान यह अवस्थित परिपाटी है। इस परिपाटी से
- -.. १. धवल पु. ८ पृ. ३२२। २. गाथा ४६९-५२६ की टीका भी देखें। ३. गो. जी. (कलकत्ता संस्करण) शास्त्राकार पृ. ६३२ और ६३४ पर वृत्तियों में लिखा है कि वे गाथाएँ माघवचन्द्र विद्यदेव की है। ४. कोषद्धा माणद्घा मायाद्धः लोइया जहाणियाम्रो वि उनकस्सियानो वि तोमुहतं । ज.ध. पु. १२ पृ. १५] । ५. ज.ध. पु. १२ पृ. १६ ।