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गाथा २६०-२६५
कायमागंगा/ ३६७
होते हैं । धुनिभेद में प्रायुबन्ध के ६ स्थान इस प्रकार हैं-१, छहों मिश्रित लेश्या स्थान में १ चारों आयु का बन्ध स्थान, २. नरक निमा तीन आयु का बन्ध स्थान, ३. मनुष्य व देवायु का बन्ध स्थान ये तीन प्रायुबन्ध स्थान; २. कृष्ण बिना पांच लेश्याओं के मिश्रित स्थान में वायु का एक बन्ध स्थान ३. कृष्ण नील बिना चार लेश्याओं के मिश्रित स्थान में देवायु का एक बन्धस्थान; ४. पीतादि तीन शुभ लेश्या मिश्रित स्थान में एक देवायु का बन्ध स्थान दूसरा प्रबन्ध स्थान इस प्रकार दो स्थान; ५. पद्म व शुक्ल मिश्रित लेण्या में एक प्रबन्ध स्थान, ६. शुक्ल लेश्या में एक प्रबन्ध स्थान इस प्रकार धूलिभेद के छह लेश्या-छह लेश्या स्थानों में प्रायु बन्ध के (३-१-१+२+१+१) ६ स्थान होते हैं। जलभेद के एक लेश्यास्थान में प्रायुबन्ध का एकस्थान होता है। चार शक्तिभेदों के १४ लेश्यास्थानों में (२+ ८ ++१) २० आयुबन्ध स्थान होते हैं। यह विषय मागे दी गई तालिका पर दृष्टि डालने मात्र से स्पष्ट हो जाता है ।
इन गाथाओं से तथा धवल पु. १६ पृ. ४६६ से ४६७ के कथनों से ऐसा प्रतीत होता है कि छहों लेश्याओं में कुछ अंश ऐसे हैं जो छहों लेण्याओं में साधारण हैं, अन्यथा पृथिवी व धूलि भेद में छह लेण्या का एक स्थान सम्भव नहीं हो सकता तथा वह स्थान भी चारों प्रायुबन्ध के योग्य हो।
तीन मन्दता की अपेक्षा जघन्य व उत्कृष्ट संक्रम और प्रति ग्रह के अल्पबहुत्व इस प्रकार हैनीललेश्या का जघन्य लेश्यास्थान स्तोक है। नीललेश्या के जिस स्थान में कृष्णलेश्या से प्रतिग्रहरण होता है, वह नीललेण्या का जघन्य प्रतिग्रह स्थान उससे अनन्तगुणा है । कृष्ण का जघन्य संक्रमरथान
और जघन्य या दोनों ही शुरुष व पास हैं। नीला 4 जघन्य संक्रमस्थान अनन्तगुणा है। कृष्ण का जवन्य प्रतिग्रहस्थान अनन्तगुणा है। नील का उत्कृष्ट प्रतिग्रहस्थान अनन्त गुणा है । कृष्ण का उत्कृष्ट संक्रमस्थान अनन्तगुणा है। नील का उत्कृष्ट संक्रमस्थान और उत्कृष्ट नीलस्थान दोनों ही तुल्य व अनन्तगुणे हैं । कृष्ण का उत्कृष्ट प्रतिग्रह स्थान अनन्तगुणा है। उत्कृष्ट कृष्णलेण्यास्थान अनन्तगुणा है ।
इस अल्पचहत्व से यह स्पष्ट हो जाता है कि कृष्ण लेश्या और नीललेझ्या के कुछ मध्यम अंश परस्पर समान हैं। इसी प्रकार नील लेश्या और कापोतलेश्या के संक्रमणस्थान व प्रतिग्रहस्थानों के अल्पबहुत्व कथन से यह सिद्ध हो जाता है कि नील और कापोतलेण्या के कुछ मध्यम अंश एक हैं। इसी प्रकार कापोत व तेजोलेश्या, तेजोलेश्या व पपलेश्या, पालेश्या व शुक्ल लेश्या के संक्रमण व प्रतिग्रहस्थानों के अल्पबहत्व के कथन से यह सिद्ध हो जाता है कि ऊपर व नीचे की लेश्याओं के कुछ मध्यम अंश परस्पर सदृश हैं। अतः निम्नलिखित अल्पबहुत्व कहा गया है
कापोत का जघन्यस्थान सबसे मन्द अनुभाग से संयुक्त है, नीललेश्या का जघन्यस्थान उससे अनन्तगुणा है । कृष्णलेश्या का जघन्य स्थान उससे अनन्तगुणा है, तेजलेश्या का जघन्य स्थान अनन्तगुणा है, पद्मलेश्या का जघन्यस्थान अनन्त गुणा है, शुक्ल लेश्या का जघन्य स्थान अनन्तगुणा है, कापोत का उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है, नील का उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है, कृष्ण का उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुरणा है, तेज का उत्कृष्ट स्थान अनन्त गुरणा है, पद्म का उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुणा है, शुक्ल का उत्कृष्ट स्थान अनन्तगुरणा है ।
१. प्रबल पु. १६ पृ. ४९८ । २. धवल पु. १६ पृ. ४८९ ।