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________________ यथा जीवकाण्ड की गाथा संख्या २, ८, १७, १८, २०, २२, २७ से २६, ३१, ३३, ३४, ४६, ५१, ५५, ५.४, ५६, ५७, ६१ से ६८, १२२, १२८, १४६ से १४८, १५०, १५१, १६६, १७३, १८५, १८६, १६१, १६२, १६४, १६६, १६७, २०१, २०२, २१७ से २२१, २३०, २३१, २३३, २३८ से २४०, २४२, २७२ से २७५,२८३ से २८६,२८८,२६८,३०२ से ३०५, ३१४, ३६६,४३७, ४५६, ४६६ से ४७१, ४७३ से ४७७, ४८२ से ४८५, ५०८ से ५१६, ५५५, ५५६, ५६०, ५६६, ५७३, ५७४, ५८१, ५८८, ६०१, ६२४ से ६२८, ६३२, ६४१, ६४५ से ६४६, ६४८, ६४६ ६५२, ६६६ ये गाथाएं ज्यों-की-त्यों धवला से ली गई हैं। इन गाथानों में किन्हीं को मापने प्रसंगानुरूप यत्किचित् परिवर्तन के साथ भी अपने ग्रन्थ (जीवकाण्ड) में गृहीत किया है । इस तरह गोम्मटसार में पूर्ववर्ती ग्रन्थों से कितनी ही गाथाओं को लेकर उन्हें ग्रन्थ का अंग तो बनाया गया है परन्तु वहाँ 'ग्रन्थकार' अथवा "उक्तं च" आदि के रूप में किसी भी प्रकार की सूचना नहीं दी गई है। ___ इस प्रकार गोम्मटसार (जीवकाण्ड व कर्मकाण्ड) एक संग्रह - ग्रन्थ है। यह बात कर्मकाण्ड की गाथा सं. ६६५' में आये हुए "गोम्मटसंगहमुत्तं" नाम से स्पष्ट है। यह संकलन बहुत ही ध्यवस्थित, सन्तुलित तथा परिपूर्ण है। इसी से दिगम्बर साहित्य में दीर्घ काल से इसका विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। . इन ::३४ गाथाओं में गागर में सागर भर दिया गया है। धवला ग्रन्थ राज का सार इस जीवकाण्ड में बहुत करके या गया है। विषय परिचय-गोम्मटसार ग्रन्थ दो खण्डों में है (१) जीवकाण्ड और (२) कर्मकाण्ड । कर्मकाण्ड में याठ कर्मों की विविध अवस्थानों का सांगोपांग वर्णन है । जीवकाण्ड में बाईस अधिकारों में अशुद्ध जोव का गुणस्थानों तथा मार्गणास्थानों के माध्यम से वर्णन किया गया है। यद्यपि इसमें प्रात्मा या जीवद्रव्य की संसारावस्था का वर्णन ही मुख्य है तथापि यह आत्मद्रव्य के शुद्ध एवं कालिक सहज स्वरूप पर भी प्रकाश डालता है। ग्रन्थ की बीस प्ररूपणा का वर्णन करने वाले अधिकारों की अन्तिम गाथात्रों द्वारा यह सहज ही जाना जा सकता है। गाथा संख्या ६८, ६६, १५२ २०३, २४३, २७६, २८६, ४६०, ४७५, ४८६, ५५६. ५५६, ७३१, शुद्ध जीव अथवा जीव की शुद्ध परिणति विषयक वर्णन भी करती हैं। ग्रन्थ की प्रथम गाथा मंगलाचरणरूप है और अन्तिम गाथा प्राणीर्वचनात्मक है। * प्रस्तुत भाषा-टीका * प्रेरणा-स्रोत-सितम्बर १६७८ में पूज्य गुरुजी (मुख्तार मा०) आनन्दपुर काल में थे। उस समय पूज्य प्राचार्यकल्प १०८ श्री श्रुतसागरजी महाराज ससंघ बर्षायोग में वहीं विराजमान थे। गुरुजी वहां गो. सा. कर्मकाण्ड के सम्पादन-कार्य में व्यस्त थे। वे शीघ्रता से उसे पूरा करना चाहते थे, क्योंकि वे चाहते थे कि उनके जाने (देह-विसर्जन करने ) से पूर्व यह कार्य पूरा हो जाये, प्रतः १, गोम्मटसंगहमुत्तं गोम्मटदेवैरण गोम्मटं रइयं । कम्मा गिज रटं तच्चदृवधारणटलं च ।। ६६५ गो० का तथा गाथा ६६८ ।। [१०]
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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