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________________ गाथा २५०-२५१ योगमार्गगा/३२६ किया ।।४६४।। पर्याप्त काल बढ़ाने के लिए विग्रहगति से उत्पन्न होने का निषेध किया गया। उत्कृष्ट दिने बजि को प्राप्त ||४६५।। सबसे अल्प अन्तर्मुहर्त काल के द्वारा सब पर्याप्तियों से पर्याप्त हो ।।४६६। वहाँ तैतीस सागर आयूप्रमाण भवस्थिति का पालन करता हुप्रा बहुत-बहुत बार उत्कृष्ट योगस्थानों को प्राप्त होता है। बहुत-बहुत बार विपुल संक्लेश परिणाम वाला होता है ।।४६७, ४६८, ४६६।। बहुत पुद्गलों का संग्रह करने के लिए उत्कृष्ट योगवालों में घुमाया। संचित हुए तेजस पुदगलों का उत्कर्ष करने के लिए सक्लेश का कथन पाया है । प्रौदारिक शरीर, वैक्रियिक शरीर और पाहारकशरीर के पुद्गलों का उत्कर्ष नहीं होता, क्योंकि उन शरीरों के कथन में संक्लेश का कथन नहीं पाया है। इस प्रकार परिभ्रमण करके जीवितव्य के स्तोक शेष रहने पर योग यवमध्य के ऊपर अन्तर्मुहुर्त काल तक ठहरा ।।४७०।। अन्तिम जीवगुणहानि स्थानान्तर में प्रावली के असंख्यातवें भाग प्रमाण काल तक रहा ॥४७१।। द्विचरम और त्रिचरम समय में उत्कृष्ट संक्लेश को प्राप्त हुया ॥४७२॥ चरम और द्वि चरम समय में उत्कृष्ट योग को प्राप्त हुया ॥४७३।। चरमसमयवर्ती तद्भवस्थ बह जीव तैजस शरीर के उत्कृष्ट प्रदेशाग्र का स्वामी है ॥४७४।। छयासठ सागर स्थिति के प्रथम समय में जो तेजस शरीर पुद्गल स्कन्ध बँधा था, स्वामित्व के अन्तिम समय में वह अन्तिम गोपुच्छ मात्र शेष रहता है जो कर्मस्थिति के द्वितीय समय में बाँधा वह स्वामित्व के अन्तिम समय में चरम और द्विचरम गोपुच्छ मात्र शेष रहता है [इसी प्रकार चलते हुए कर्मस्थिति के अन्तिम समय में बाँधा हुआ समयप्रबद्ध पूर्णरूपेण (पूरा का पूरा) शेष रहता है। ] इस प्रकार अन्तिम समय में डेढ़ गुणहानि मात्र समयप्रबद्ध प्रमाण तेजस शरीर का द्रव्य होता है। कार्मणशरीर प्रदेशाग्र का स्वामी निम्न जीव है जो जीव बादर पृथिवीकायिक जीवों में कुछ अधिक दो हजार सागरोपम से कम कमस्थिति प्रमाणकाल तक रहा। शङ्खा--अपकायिक, वायुकायिक व वनस्पतिकायिक जीवों में क्यों नहीं उत्पन्न कराया ? समाधान- नहीं, क्योंकि उनके पर्याप्त व अपर्याप्त योग से पृथिवीकायिक जीवों का पर्याप्त व अपर्याप्त योग असंख्यातगुरणा है।' शङ्कर--बादर पृथिवीकायिकों में सम्पूर्ण कर्मस्थिति प्रमारण काल तक क्यों नहीं घुमाया ? ___समाधान नहीं, क्योंकि एकेन्द्रियों में प्रसों का योग और आयु असंख्यातगुणी होती है और बे संक्लेश-बहुल होते हैं, इसलिए पृथिवीकायिकों में घुमाने के पश्चात् प्रसों में घुमाया । यदि एकेन्द्रियों में ही रखते तो इनकी अपेक्षा त्रसों में जो असंख्यातगुणे द्रव्य का संचय होता है वह नहीं प्राप्त होता। यही कारण है कि सम्पूर्ण कर्मस्थिति प्रमाण काल तक एकेन्द्रियों में नहीं घुमाया है । शखा-सकामिकों में अपनी स्थिति प्रमाण काल के भीतर उत्कृष्ट द्रव्य का संचय करके पुनः बादर पृथिवीकायिकों में उत्पन्न होकर वहाँ अन्तर्मुहुर्त रह कर फिर वसस्थितिकाल तक सों में भ्रमण करके एकेन्द्रियों में उत्पन्न कराते। इस प्रकार कर्मस्थितिप्रमाण काल तक बयों नहीं घुमाया ? १. प.पु. १७ पृ. ३२ । २. घ.पु. १० पृ. ३३ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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