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________________ २)गो. मा. जीवकाण्ड हैं: सम्यक्त्वादि पाठ गुणों के प्रकट हो जाने से जो गुणरत्नभूषण हैं तथा वे सिद्ध जिनेन्द्रवर नेमिचन्द्र भी हैं (कर्मजेता -जिन' ; परम ऐश्वर्य शोभितः इन्द्र; वर- उत्कृष्ट ; नेमि = ज्ञान; चन्द्र = परमसुख भोक्ता: वर नेमि = उत्कृष्ट ज्ञानी : सभी विशेषरा सिद्धों के हैं।); ऐसे सिद्धों को नमस्कार करके मैं (नेमिचन्द्राचार्य) जीवनरूपणा का कथन करूगा। इस गाथा के तीन चरण मङ्गलरूप हैं, क्योंकि इसमें जिनेन्द्रदेव के गुणों का कीर्तन किया गया है। जिनेन्द्र देव के कीर्तन से विघ्न नाश को प्राप्त होते हैं, कभी भय उत्पन्न नहीं होता, दुष्टदेवता आक्रमण नहीं कर सकते और निरन्तर इच्छित अर्थ की सिद्धि होती है, अतः प्रारम्भ किये गए किसी भी कार्य के प्रादि, मध्य और अन्त में मङ्गल करना चाहिए, क्योंकि निविघ्न कार्य-सिद्धि के लिए जिनेन्द्र गुरकीर्सनलप जलायक है। मङ्गल दो प्रकार का है-निवद्धमङ्गल, अनिबद्धमङ्गल । निबद्धमङ्गल - ग्रन्थ की आदि में ग्रन्थकर्ता द्वारा मङ्गलस्वरूप गाथा की रचना स्वयं करके जो इष्टदेवता को नमस्कार किया जाता है, वह निबद्धमङ्गल है तथा जो मङ्गलस्वरूप गाथा ग्रन्थकार के द्वारा स्वयं नहीं रची जाती है, वह अनिबद्धमङ्गल है । इस गोम्मटसार जीवकाण्ड ग्रन्थ के आदि में जो यह मङ्गलरूप गाथा है, वह निबद्धमङ्गल है. क्योंकि इष्टदेव को नमस्काररूप यह गाथा स्वयं ग्रन्थकर्ता द्वारा रची गई है। शडा-ग्रन्थ स्वयं मंगलरूप है या अमङ्गलरूप ? यदि ग्रन्थ स्वयं मङ्गलरूप नहीं है तो वह ग्रन्थ भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि मङ्गल के अभाव में पाप का कारगा होने से उसका ग्रन्थपने से विरोध है। यदि ग्रन्थ स्वयं मङ्गलरूप है तो फिर उसमें अलग से मङ्गल करने की क्या आवश्यकता है, क्योंकि मंगलरूप ग्रन्थ से ही कार्य की निष्पत्ति हो जाती है ? समाधान - ग्रन्थ के आदि में मङ्गल किया गया है, तथापि पूर्वोक्त दोष नहीं आता, क्योंकि ग्रन्थ और मङ्गल इन दोनों से पृथक्-पृथक् रूप में पापों का विनाश होता है। निबद्ध और अनिबद्ध मङ्गल पठन में आने वाले विनों को दूर करता है और ग्रन्थ प्रतिसमय असंख्यात गुरिणत धेरिणरूप से पापों का नाश करके उसके बाद सम्पूर्ण कर्मों के क्षय का कारण होता है। शङ्खा-देवता-नमस्कार भी अन्तिम अवस्था में सम्पुर्ण कर्मों का भय करने वाला होता है, इसलिए मङ्गल और ग्रन्थ दोनों एक ही कार्य को करने वाले हैं। फिर दोनों का कार्य भिन्न क्यों बतलाया गया? समाधान-सा नहीं है, क्योंकि ग्रन्थकथित विषय के परिज्ञान के बिना केवल देवतानमस्कार में कर्मक्षय का सामथ्र्य नहीं है। मोक्ष की प्राप्ति शुक्लध्यान से होती है, किन्तु देवतानमस्कार शुक्लध्यान नहीं है। - - १. विघ्नाः प्रणश्यन्ति भयं न जातु, न दुष्टदेवा: परिलयन्ति । अर्थान्यथेष्टाश्च सदा लभन्ते, जिनोनभानां परिकर्तिमन ।। २. पादौ मध्यावमान न मङ्गलं भाषितं वुधैः । तजिनेन्द्रगुणस्तोत्र सदविघ्नप्रसिद्धये ॥ [प. पु. १ पृ. ४२] ३. ध. पु १ पृ. ४३ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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