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________________ २६८/मो. सा. जीवकाण्ड गाया २२२-२२४ शङ्का विकलेन्द्रियों के बचनों में अनुभयपना कैसे प्रासकता है ? समाधान-विकलेन्द्रियों के बचन अनध्यवसाय रूप ज्ञान के कारण हैं, इसलिए उन्हें अनुभयरूप कहा है।' शङ्का-विकलेन्द्रियों के वचनों में ध्वनिविषयक अध्यवसाय अर्थात् निश्चय तो पाया जाता है, फिर उन्हें अनध्यवसाय का कारण क्यों कहा जाता है ? समाधान- नहीं, क्योंकि यहाँ पर अनध्यवसाय से वक्ता के अभिप्राय विषयक अध्यवसाय का अभाव विवक्षित है। सत्य वचनयोग संज्ञी मिथ्यादृष्टि से लेकर सयोगकेवली गुणस्थान तक होता है । दसों ही प्रकार के सत्यवचनों के उपयुक्त तेरह गृणस्थानों में पाये जाने में कोई विरोध नहीं आता है, इसलिए उनमें दसों प्रकार के सत्यवचन होते हैं । मृषावचनयोग और सत्यमृषाबननयोग संज्ञी मिथ्याष्टि से लेकर क्षीण कषाय-बीतरागछपस्थ गुणस्थान तक पाये जाते हैं।' शङ्का-जिसकी कापायें क्षीण हो गई हैं ऐसे जीव के वचन असत्य कैसे हो सकते हैं ? समाधान--ऐसी शंका व्यर्थ है, क्योंकि असत्य बचन का कारण अज्ञान बारहवें गुणस्थान तक पाया जाता है, इस अपेक्षा से वहाँ पर असत्य वचन के सद्भाव का प्रतिपादन किया है और इसीलिए उभय संयोगज सत्यमृषा वचन भी बारहवें गुणस्थान तक होता है, इस कथन में कोई विरोध नहीं आता। ___ शङ्का-वचनगुप्ति का पूरी तरह से पालन करने वाले कषायरहित जीवों के वचनयोग कैसे सम्भव है ? समाधान नहीं, क्योंकि कषाय रहित जीवों में अन्तर्जल्प के पाये जाने में विरोध नहीं पाता ।" दृष्टान्तपूर्वक दस प्रकार के सत्य वचन जगवदसम्मदिठवरगाणामे रूवे पटुच्चववहारे । संभावरगे य भावे उवमाए दसविहं सच्चं ॥२२२॥ भत्तं वेवी चंदप्पहपडिमा तह य होवि जिरणदत्तो। सेदो दिग्धो रज्झदि कुरोत्ति य जे हवे वयणं ॥२२३॥ सक्को जंबूदीवं पल्लवि पायवज्जवयणं च । पल्लोवमं च कमसो जगपदसच्चादि दिट्ठता ।।२२४॥ १. धवल पु. १ पृ. २८७। २. "सच्चवचिजोगो सणिमिच्छाइद्वि-प्पटि जाव सजोगि केवलि ति ।।५४॥" [धवल पु. १ पृ. २८८] । ३, "मोसवचि जोगो सच्चमोस वचिजोगो सणिण मिच्छाइट्टि-प्पटुडि जाब खीणाकमाय-वीयराय-छदुमत्था ति ।। ५५।।'' [धवल पृ. १ पृ. २८६] । ४. धवल पु. १ पृ. २८६ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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