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________________ २९६ / गो. सा. जीवकाण्ड नाथा २२०-२२१ समाधान- द्रव्यमन के कार्यरूप उपयोगात्मक क्षायोपशमिक आन का अभाव भले ही रहा आवे, परन्तु द्रव्यमन के उत्पन्न करने में प्रयत्न तो पाया हो जाता है, क्योंकि द्रव्यमन की वर्मणाओं को लाने के लिए होने वाले प्रयत्न में कोई प्रतिबन्धक कारण नहीं पाया जाता। इसलिए यह सिद्ध हुआ कि उस मन के निमित्त से जो आत्मा का परिस्पन्द रूप प्रयत्न होता है, वह मनोयोग है ।" शङ्का - जब केवली के (भाव) मन नहीं है, तो उससे सत्य और अनुभय इन दो प्रकार के वचनों की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? समाधान- नहीं, क्योंकि उपचार से मन के द्वारा उन दोनों प्रकार के वचनों की उत्पत्ति का विधान किया गया है। सत्य मनोयोग और उभयमनोयोग संज्ञी मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर क्षीणकषाय वीतराग छद्मस्थ गुणस्थान तक पाये जाते है । " शङ्का - क्षपक और उपशमक जीवों के सत्यमनोयोग और अनुभव मनोयोग का सद्भाव रहा आवे, परन्तु शेष दो अर्थात् ग्रसत्यमनोयोग और उभयमनोयोग का सद्भाव नहीं हो सकता है, क्योंकि इन दोनों में रहने वाला श्रप्रमाद वह असत्य और उभयमन के कारणभूत प्रमाद का विरोधी है। अर्थात् क्षपक और उपशमक प्रमादरहित होते हैं, इसलिए उनके असत्य मनोयोग और उभयमनोयोग नहीं पाये जा सकते हैं ? समाधान- नहीं, क्योंकि आवरणकर्म से युक्त जीवों के विपर्यय और अनध्यवसाय के कारणभूत मन का सद्भाव मान लेने में कोई विरोध नहीं आता है । परन्तु इसके सम्बन्ध से क्षपक या उपशमक जीव प्रमत्त नहीं माने जा सकते, क्योंकि प्रमाद मोह की पर्याय है । दसविहसच्चे वयणे जो जोगो सो दु सच्चवचिजोगो । तविरोश्रो मोसो जाणुभयं सच्चमोसो ति ॥ २२० ॥ * जो सोव सच्चमोसो सो जारण प्रसच्च मोसवचिजोगो । श्रमणाणं जा भासा सरपणातरणी श्रादी ॥२२॥ * गाथार्थ दस प्रकार के सत्यवचन में जो योग होता है, वह सत्य वचन योग है। इससे विपरीत योग मृषा वचनयोग है। सत्य-मृषा वचनयोग उभय वचनयोग है। जो वचन न तो सत्यरूप हो और न मृषा ही हो वह असत्यमृषा वचनयोग है। प्रसंज्ञो जीवों की भाषा और संज्ञो जीवों में जो मंत्र आदि भाषा है वह ग्रनुभय भाषा है ।। २२०-२२१॥ १. बबल पु. १ पृ. २८४ । २. धवल पु. १ पृ. २६५ ३. "मोममरण जोगोसच्चमो समणजोगी सएि मिच्छाइट्टि - प्हुडि जाव खीशा कसाय- बीयराय-दुमत्या त्ति ॥५१॥" [त्र. पु. १ पृ. २६५ ] ४. श्रदल पु. १ पृ. २०६६ प्रा. पं. सं. पृ. ११ मा ६१ व पृ. ५७८ गा. ८५ ५. जल पु. १ पृ. २८६ प्रा. पं. स. पू. १९ गा. ९२ व पृ. ५७८ मा. ८६ ॥
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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