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________________ २६४ /गो. सा. जीवकाण्ड गाथा २१७-२१९ गाथार्थ-सत्य, असत्य, उभय और अनुभय पदार्थों में जो मन वचन की प्रवृत्ति होती है उस समय में मन और वचन का वही नाम होता है और उसके सम्बन्ध से उस प्रवृत्ति (योग) का भी वही नाम होता है ।।२१७।। सद्भाव सो सत्य है उस सम्बन्धी मन सत्यमन है । उस सत्यमन से होनेवाला योग सत्य मनोयोग है, इससे विपरीतयोग मृषामनोयोग है, उभय रूपयोगसत्यमृषामनोयोग है ।।२१८॥ जो मन, सत्य और मृषा से युक्त नहीं होता वह असत्यमृषामन है, उससे होने वाला योग असत्यमृषामनोयोग है ।।२१।। विशेषार्थ-मनोयोग चार प्रकार का कहा गया है। इस सम्बन्ध में निम्न सूत्र है-- -'भणजोगो चम्विहो, सच्चमणजोगो मोसमणजोगो सचमोसमराजोगो असन्धमोसमरणजोगो चेदि ।।४६॥" [षट् खण्डागम संत-परूवणा धवल पु. १ पृ. २८०] मनोयोग चार प्रकारका है, सत्यमनोयोग, मृषामनोयोग, सत्यमूषामनोयोग, असत्यमृषामनोयोग ।।४६॥ सत्य, अवितथ और अमोघ, ये एकार्थवाची शब्द हैं। सत्य सम्बन्धित मन सत्यमन है और उसके द्वारा जो योग होता है वह सत्यमनोयोग है । इससे विपरीतयोग मृषामनोयोग है । जो योग सत्य और मृषा इन दोनों के संयोग से उत्पन्न होता है वह सत्यमृषा मनोयोग है। सत्यमनोयोग और मृषा मनोयोग से व्यतिरिक्त योग असत्यमृषामनोयोग है। शङ्कर-असत्यमृषामनोयोग अर्थात् अनु भयमनोयोग कौनसा है ? समाधान—समनस्क जीवों में वचनप्रवृत्ति मानसशानपूर्वक होती है, क्योंकि मानसज्ञान के बिना उनमें वचन-प्रवृत्ति नहीं पाई जाती। इसलिए उन चारों में से सत्यवचननिमित्तक मन के निमित्तसे होने वाले योग को सत्यमनोयोग कहते हैं। असत्य बचन-निमित्तक मन से होने वाले योग को असत्य मनोयोग कहते हैं। सत्य और मृषा इन दोनों रूप बचननिमित्तक मनसे होने वाला योग उभय मनोयोग है। इन तीनों प्रकार के वचनों से भिन्न आमन्त्रण प्रादि अनुभय वचन निमित्तक मन से होने वाला योग अनुभय मनोयोग है। तथापि यह कथन मुख्यार्थ नहीं है, क्योंकि इसकी सम्पूर्ण मन के साथ व्याप्ति नहीं पाई जाती है। अर्थात् उक्त कथन उपचारित है क्योंकि बचन की सत्यादिकता से मन में सत्य आदि का उपचार किया गया है । शङ्का--यहाँ पर निर्दोष अर्थ कौनसा लेना चाहिए । समाधान-मन की यथार्थ प्रवृत्ति सत्यमन है ।२ जैसी वस्तु है वैसी प्रवृत्ति करने वाला सत्य मन है। इससे विपरीत मन असत्यमन है। सत्य और असत्य इन दोनों रूप मन उभय मन है। तथा जो संशय और अनध्य बसाय रूप ज्ञान का कारण है वह अनूभय मन है। अथवा मन में सत्य, असत्य आदि बचनों को उत्पन्न करनेल्प योग्यता है, उसकी अपेक्षा से सत्यवचनादि के निमित्त से होने के कारण जिसे पूर्व में उपचार कहा गया है, वह कथन मुख्य भी है। मामान्य मनोयोग, सत्यमनोयोग तथा असत्यमृषामनोयोग संज्ञी मिथ्यादृष्टि से लेकर सयोग १. धवल पु. १ पृ. २८१ । २. यथावस्तुप्रवृक्ष मनः सत्यापन: । [धवल पु. १ पृ. २८१] ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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