SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 326
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गाथा २१७-२१६ योगमार्गणा / २६३ at बढ़ता है तब उस वीर्य को पाकर चूकि जीवप्रदेशों का संकोच - विकोच बढ़ता है, इसलिए योग क्षायोपशमिक है ।" शङ्का-यदि वीर्यान्तराय कर्म के क्षयोपशम से उत्पन्न हुए बल की वृद्धि और हानि से जीवप्रदेशों के परिस्पन्द की वृद्धि और हानि होती है, तो जिसके अन्तराय कर्म क्षीण हो गया है ऐसे सिद्ध जीव में योग की बहुलता का प्रसंग आता है ? समाधान- नहीं आता, क्योंकि क्षायोपशमिक बल से क्षायिक बल भिन्न देखा जाता है । क्षायोपशमिक बल की वृद्धिहानि से वृद्धि-हानि को प्राप्त होने वाला जीवप्रदेशों का परिस्पन्द क्षायिक बल से वृद्धि हानि को प्राप्त नहीं होता, क्योंकि ऐसा मानने से तो अतिप्रसंग दोष आजायेगा । शङ्का - यदि योग वीर्यान्तराय कर्म के क्षयोपशम से उत्पन्न होता है, तो सयोगकेवली में योग प्रभाव का प्रसंग श्राता है ? समाधान- नहीं आता, क्योंकि योग में क्षायोपशमिक भाव तो उपचार से माना गया है । असल में योग प्रदयिक भाव ही है । औदयिक योग का सयोगकेवली में प्रभाव मानने में विरोध आता है। योग मार्गादधिक है, क्योंकि वह नामकर्म की उदीरणा व उदय से उत्पन्न होती है । 3 योग की उत्पत्ति तत्प्रायोग्य अघातिया कर्म के उदय से होती है, अतः योग औदयिक भाव है। शङ्का - योग को क्षायोपशमिक भी तो कहा गया है ? समाधान - वीर्यान्तराय के क्षयोपशम से योग की वृद्धि देखकर क्षायोपशमिक कहा गया है। वह भी घटित हो जाता है | ४ योगविशेष का लक्षण मरवरपाण पत्ती सच्चासच्चु भयप्रणुभयत्येसु । ५ तण्णामं होवि तदा तेहि दु जोगा हु तज्जोगा ||२१७ ।। सब्भावो सच्चमरणो जो जोगो तेरा सच्चमरगजोगो । तदिवरीदो मोसो जाणुभयं सच्चमोसं ति ॥२१८॥ रंग सच्चमो जुत्तो जो दु मरणो सो प्रसच्च मोसमरणो । जो जोगो तेरण हवे सच्चमोसो दु मरणजोगो ॥ २१६ ॥ * १. ध. पु. ७ पृ. ७५ । २. धवल पु. ७ . ७६ ३. धवल पु. ९ पृ. ३१६ । ४. धवल पु. १० पृ. ४३६ । ५. मुद्रित पुस्तक में 'सम्भाषमणे सच्चो' यह पाठ है जो प्रशुद्ध प्रतीत होता है किन्तु धवल पु. १. २८१ पर 'सन्भावसच्चमरण' यह पाठ है, इसको ही यहाँ पर पड़ा किया गया है। ६. धवल पु १ पृ. २६२ । प्रा.पं.सं ० पु. १८
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy