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गाथा २०५
कायमार्गगा/२८१
प्रमाण को देय रूप से देकर परस्पर वगितसंवगित करके शलाकाराशि में से एक कम कर देना चाहिए। इस प्रकार पुनः पुनः करके तब तक ले जाना चाहिए जब तक कि अतिक्रान्त शलाकाओं से अर्थात् पहली दूसरी और तीसरी बार स्थापित अन्योन्य गुणकार शलाकात्रों से न्यून चौथी बार स्थापित अन्योन्य गुणकार शलाकाराशि समाप्त होती है। तब तेजस्कायिक राशि उत्पन्न होती है। उस सेजस्कायिक राशि की अन्योन्य गुणकार शलाकाएँ चौथोबार स्थापित अन्योन्य गुरणकार शलाका राशि प्रमाण हैं।
__ 'तेजस्कायिक राशि को असंख्यात लोकों के प्रमाण से भाजित करने पर जो लब्ध पाने उसे उसी तेजस्कायिक राशि के प्रमाण में प्रक्षिप्त करने पर पृथिवीकायिक राशि का प्रमाण प्राप्त होता है। इस पृथिवीकायिक राशि को असंख्यात लोकों के प्रमाण से भाजित करने पर जो लब्ध प्रावे
उसे उसी पृथिवीकायिक राशि में मिला देने पर अप्कायिक राशि का प्रमाण होता है। इस अप्कायिक मा राशि को असंख्यात लोकों के प्रमाण से भाजित करने पर जो लब्ध पावे उसे उसी अप्कायिक राशि में मिला देने पर वायुकायिक राशि का प्रमाण होता है ।
अपदिद्विवपत्तेया असंखलोगष्पमारण्या होति ।
तत्तो पदिहिदा पुरण असंखलोगेण संगुरिणवा ॥२०५।। गायार्थ --अप्रतिष्ठित प्रत्येक बनस्पतिकायिक जीव असंख्यात लोक प्रमाण हैं और उनसे सप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पतिकायिक जीव असंख्यात लोकगुणे हैं ।।२०५।।
विशेषार्थ--एक सागरोपम में से एक पल्योपम को ग्रहण करके और उस पल्योपम को श्रावली के असंख्यातवें भाग से खंडित करके वहाँ जो एक भाग लब्ध प्राप्त हो उसे पृथक् स्थापित करके शेष बहुभाग को पल्य कम सागर में मिला देने पर बादर तेजस्कायिक राशि की अर्धच्छेद शलाकाएँ होती हैं। जो एक भाग पृथक्-पृथक् स्थापित किया था, उसे फिर भी प्राबली के असंख्यातवें भाग से वंदित करके वहाँ जो एक भाग लब्ध प्राप्त हुआ उसे घटाकर अवशेष बहुभाग को बादर तेजस्कायिक राशि के अर्धच्छेदों में मिला देने से बादर वनस्पति (अप्रतिष्ठित) प्रत्येकप्रारीर जोबों की अर्धच्छेदशलाकाएँ होती हैं। इसी प्रकार वादरनिगोदप्रतिष्ठित की अर्धच्छेदशलाकाएँ प्राप्त हो जाती हैं। अर्थात् शेष एक भाग को पुनः प्रावली के असंख्यातवें भाग से खंडित कर, लब्ध प्राप्त एक खंड को पृथक स्थापित कर शेष बहुभाग को बादर बनस्पति अप्रतिष्ठित प्रत्येक जीवों की अर्धच्छेदशलाकानों में मिला देने पर निगोद-प्रतिष्ठित प्रत्येक बनस्पति की अर्धच्छेदशलाकाएँ होती हैं।
अपनी-अपनी अर्धच्छेद गलाकाओं को विरलन करके और उस बिरलित राशि के प्रत्येक एक को दो रूप करके परस्पर गुणित करने पर अपनी-अपनी राशि उत्पन्न होती है। बादर वनस्पति अप्रतिष्ठित प्रत्येक जीव राशि के अर्धच्छेद अल्प हैं, अत: यह राशि अल्प है। और निगोद प्रतिष्ठित राशि के अर्धच्छेद अधिक हैं अतः नगोद प्रतिष्ठित राशि अधिक है। अधिक अर्धच्छेदों को धनलोक के अर्धच्छेदों से भाजित करने पर जो लब्ध प्रात्रे उसको विरलित करके और उस
१. घबल पु. ३ पृ. ३४१ । २. धवल पु. ३ पृ. ३४४ । ३. त्रिलोकमार गा. ७५ ।