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________________ गाथा १८६-१८७ काय मार्गणा / २६३ बादरनिगोद से प्रतिष्ठित वनस्पति, संप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति है । शङ्का - जो बादर निगोद से प्रतिष्ठित हैं ऐसी कौनसी वनस्पतियाँ हैं ? समाधान - थूहर प्रदरख और मूली आदिक वनस्पति बादरनिगोद से प्रतिष्ठित हैं । १ वीज श्रादि की अपेक्षा वनस्पति के भेद तथा सप्रतिष्ठित प्रतिष्ठित प्रवस्था का कचन मूलगापोरबीजा खंदा तह संदबीजबीज रहा । समुच्छिमा य भणिया पत्तेयाणंतकाया य ।। १८६१ । १ गाथार्थ - मूलबीज, अग्रवीज, पर्वबीज, कन्दबीज, स्कन्धवीज, बीजरूह और सम्मूच्छ्रिम ये ta area सप्रतिष्ठित प्रत्येक और प्रतिष्ठित प्रत्येक के भेद से दोनों प्रकार की कही गई हैं ।। १६६ ।। विशेषार्थ -- जिन वनस्पतियों का बीज मूल है, वे मूलबीज वनस्पतियाँ हैं जैसे अदरक, हल्दी श्रदि । जिन वनस्पतियों का बोज उनका ही अग्रभाग है वे अग्रबीज हैं, जैसे ग्रायंक (नेत्रवाला) आदि । जिन वनस्पतियों का बीज उनका पर्व है, वे पर्वबोज बनस्पतियाँ हैं जैसे सांठा यादि। जिन वनस्पतियों का बीज कन्द है व वनस्पतियों कन्दबीज जाननी जैसे पिडालु, रतालु, सूरण यादि। जिन वनस्पतियों का बीज स्कन्ध है, वे स्कन्धबीज बनस्पतियाँ हैं जैसे सालार ( सलई), पलास श्रादि । जो वनस्पतियाँ अपने बीज से ही लगी हैं वे बीजरूह हैं जैसे गेहूँ, शालि यादि । जिन वनस्पतियों का मूलादि नियत बीज नहीं है, चारों ओर से पुद्गल स्कन्धों को ग्रहण करके उपजी हैं वे सम्मूच्छिम वनस्पतियाँ हैं, जैसे दूब यादि । यद्यपि मूल आदि सभी वनस्पतियों का सम्मूर्च्छन जन्म है, गर्भज नहीं है तथापि जिसका कोई नियत बोज नहीं है तथा ( सत्र की अन्य प्रकार से प्राप्ति का प्रभाव है ) यद्वा तद्वा अनुकूल वातावरण मिलने पर कहीं पर भी स्वयमेव उत्पन्न हो जाती हैं, ऐसा एक सम्मूच्छिम वनस्पतिकाय का एक भिन्न भेद कहा गया है। ये सब वनस्पतियाँ प्रत्येक शरीर होते हुए अनन्तानन्त निगोद जीवों के शरीरों से प्रतिष्ठित होने के कारण परमागम में अनन्तकाय कही गई हैं । तथा 'च' शब्द से अप्रतिष्ठित का हरण करने से ये वनस्पतियाँ संप्रतिष्ठित और अप्रतिष्ठित दोनों प्रकार की होती हैं। प्रतिष्ठितप्रत्येक की उत्कृष्ट अवगाहना घनांगुल के श्रसंख्यातवेंभाग प्रमाण है । बीजे जोगीभूवे जीवो चंकमदि सो व प्रणो वा । जे वि य मूलादीया ते पत्तेया पढमदाए ॥ १८७॥ * गाथार्थ - योनिभूत बीज में वही जीव या अन्य जीव उत्पन्न होता हैं ये मुलादि प्रथम अवस्था में प्रत्येक अर्थात् प्रतिष्ठित प्रत्येक होती हैं ।१८७।। १. धवल पु. १ पृ. २७१ । २ स्वामीकार्तिकेयानुप्रेक्षा पू. ६६ । यह गाथा नं. १६० है । वल पु. १ पृ. २७३ प्रा. पं. सं. पू. १७ गाथा ८१ व पृ. ५७गामा ७६ ३. श्रीमद् प्रभयचन्द्रसिद्धान्तचक्रवर्ती कृत टीका । ४. जीवतत्वप्रदीप टीका में
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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