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________________ इन्द्रियमाणा / २४१ गाथार्थ - तीन सौ साठ कम एक लाख (१००००० - ३६० - ६६४० ) योजन को दस के वर्गमूल से गुणा करने से जो मूलराशि प्राप्त हो उसको नौ से गुरणा करके साठ से भाग देने पर क्षुइन्द्रिय के विषय का अध्वान प्राप्त होता है ।। १७० ।। गाय १७० विशेषार्थ – सूर्य की १८४ गलियाँ हैं । इन गलियों में से जब सूर्य अभ्यन्तर प्रथम गली में होता है तब सूर्य जम्बूद्वीप में १८० योजन भीतर होता है । जम्बूद्वीप की विष्कम्भ सूची एक लाख योजन है । इसमें से दोनों ओर के १८० योजन ( १८० x २ ) अर्थात् ३६० योजन करने पर ग्रभ्यन्तर गली की विष्कम्भ सूची (१००००० - ३६० = ९९६४० ) योजन प्राप्त होती है । इस विष्कम्भ सूची को दस 'वर्गमूल से गुणा करने पर अभ्यन्तर गली की परिधि होती है, जिसका प्रसारण निकटतम ३१५०८६ योजन है । इस परिधि पर एक सूर्य को दो रात-दिन अथवा ४८ घंटे या ६० मुहूर्त लगते हैं। जब सूर्य अभ्यन्तर प्रथम गली में होता है तब दिन ग्रठारह मुहूर्त का होता अतः अयोध्या है।" अतः सूर्योदय होने के नव मुहूर्त पश्चात् सूर्य अयोध्यानगरी पर होता है । नगरी से सूर्योदय तिनी दूरी पर होता है उसका प्रमाण प्राप्त करने के लिए अभ्यन्तर प्रथम गली की परिधि को साठ से भाग देने पर सूर्य का एक मुहूर्त का गमनक्षेत्र प्राप्त हो जाता है।" पुनः उसको नौ से गुणा करने पर मुहूर्त का गमनक्षेत्र प्राप्त होता है अर्थात् अयोध्यानगरी से सूर्योदय की दूरी प्राप्त हो जाती है । अभ्यन्तर प्रथम गली की परिधि ३१५०८६ योजन है, इसको ६० से भाग देकर 2 से गुणा करने पर अथवा ( - ) २० से भाग देकर ३ से गुणा करने पर ( ३१५०८६४ ) = ४७२६३० योजन प्राप्त होते हैं ।" योजन में एक कोस, बारह सौ पन्द्रह धनुष एक हाथ, दो अंगुल और यव का कुछ अधिक चतुर्थभाग प्राप्त होते हैं। इस सम्बन्ध में ये गाथाएँ भी उपयोगी हैं अस्सीदिदं विगुणं दोषविसेसस्स वग्ग बहुगुणियं । सद्विहितं विद्धमाणातं चक्खू ।।५७ ॥ * मूलं जब सूर्य अभ्यन्तर प्रथम गली में होता है तब वह जम्बूद्वीप में १५० योजन अभ्यन्तर की बोर होता है। दोनों ओर से १५० योजन कम करने पर द्विगुण (१५०x२) अर्थात् ३६० योजन, जम्बूद्वीप की विष्कम्भ सूची एक लाख योजन में से कम करने पर शेष ( १००००० - ३६० ) = ६६६४० रह जाते हैं । इसका वर्ग करके फिर इसको १० से गुणा करके वर्गमूल करने पर अभ्यन्तर 'गली की परिधि का प्रमाण ३१५०८६ होता है । इसको ६० से भाग देवर से गुणा करने पर चक्षूइन्द्रिय का उत्कृष्ट क्षेत्र प्राप्त होता है । श्रादिमपरिहि तिगुणिय बीसहिदो लद्धमेत्ततेसट्ठी । दुसया सत्तत्तालं सहस्सया वीसहरिदससंसा ॥ ४३० ॥ १० एवं चप्पासोषिक व वेलस्स होदि परिमाणं ।। ४३१ ।। पूर्वार्ध - यादिम गली की परिधि को तिगुणा करके बीस का भाग देने पर सैंतालीस हजार दो सौ १. नि. प. ७/२१६ ६. ति.प. ७ / २६६ ॥ की संस्कृत टीका । יין २. वि.प. ७ / ४२६ । ३. ति.प. ७ / २५४ । ४. वि.प. ७ / २६६ ५. श्र.मागा. ३:६ । ७. त्रि.सा.गा. ३५९ ३६१ व सस्कृत टीका | ८. मुलाचार पर्याप्यधिकार १२ गाथा ४६ C. मूलाचार पर्यायधिकार १२ । १०. वि.प. ७/४५० ११. ति.प. ७/४३१ पूर्वा 1
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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