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________________ गाथा १५६ गतिमार्गरणा / २१७ गणनानन्तों में से भी सर्व जीवराशि अनन्तानन्त है, क्योंकि काल की अपेक्षा सर्व जीवराशि अनन्तानन्त वर्सापरियों और उत्सर्पिणियों के द्वारा अपहृत नहीं होती है ।" वह अनन्तानन्त भी तीनप्रकार का है । जघन्य अनन्तानन्त उत्कृष्ट अनन्तानन्त और मध्यम अनन्तानन्त । शङ्का – इन तीनों श्रनन्तानन्तों में से जीवराशि कौन सा श्रनन्तानन्त है ? समाधान -- जीवराशि मध्यम अनन्तानन्त है, क्योंकि जहाँ-जहाँ 'मनन्तानन्त' कहा जाता है वहाँ-वहाँ प्रजनन्यानुत्कृष्ट अर्थात् मध्यम अनन्तानन्त का ग्रहण होता है । शङ्का – यह मध्यम श्रनन्तानन्त भी अनन्तानन्त विकरूपरूप है। उनमें से किस विकल्प से प्रयोजन है ? समाधान -- जघन्य अनन्तानन्त से अनन्त वर्गस्थान ऊपर जाकर और उत्कृष्ट अनन्तानन्त से अनन्त वर्गस्थान नीचे प्राकर- जो राशि उत्पन्न होती है वह राशि यहाँ पर अनन्तानन्त पद से ग्राह्य है । श्रथवा जघन्य अनन्तानन्त के तीन बार वर्गित संवर्गित करने पर जो राशि उत्पन्न होती है । उससे श्रनन्तगुणी और छहद्रव्यों के प्रक्षिप्त करने पर जो राशि उत्पन्न होती है उससे अनन्तगुणी हीन मध्यम अनन्तानन्त राशि से प्रयोजन है । " शङ्का-तीन बार वर्गित संवर्गित करने से उत्पन्न हुई यह महाराणि सम्पूर्ण जीवराशि से अनन्तगुणी हीन है, यह कैसे जाना जाता है ? समाधान – जघन्य श्रनन्तानन्त के उत्तरोत्तर वर्ग करने पर जधन्य अनन्तानन्त के अधस्तन वर्गस्थानों से ऊपर मध्यम अनन्तानन्तगुणं वर्गस्थान जाकर सम्पूर्ण जीवराशि की वर्गशलाका उत्पन्न होती है, जबकि तीन बार वर्गित संवर्गित करने से उत्पन्न राशि की वर्गशलाका इससे पूर्व ही उत्पन्न हो जाती है (यानी जघन्य अनन्तानन्त के अवस्तन वर्गस्थानों से ऊपर कुछ अधिक जघन्य परीतामतगुणे वर्गस्थान जाकर ही उत्पन्न हो जाती है) । इससे जाना जाता है कि जीवराशि की वर्ग जलाका से तीन बार वर्गित संवर्गित● की वर्गशलाकाएँ अनन्तगुणी हीन हैं । अतः राशि भी अनन्तगुणी हीन है । बात यह है कि व्यय होने पर समाप्त होने वाली राशि को अनन्तरूप मानने में विरोध प्राता है। इसप्रकार कथन करने से अर्धपुद्गलपरिवर्तन के साथ व्यभिचार दोष भी नहीं आता, क्योंकि पुद्गल परिवर्तनको उपचार से अनन्त माना है। शङ्का -- जिसमें छह द्रव्य प्रक्षिप्त किये गये हैं, यह राशि कौनसी है ? समाधान- तीन बार वर्गित संवर्गित राशि में सिद्ध, निगोदजीव, वनस्पतिकायिक, पुद्गल, काल के समय और अलोकाकाश ये छह अनन्तराशियों मिला देनी चाहिए। सिद्धाणिगोवजोबा वणक्कदो कालो य पोगला चेय । सव्वलो गागासं छप्पेदे-गंत पक्वा ||३१२ ॥ । [ ति.प.प्र. ४ ] १. "श्रताणताहि सपरिण-उस्सप्पिणीहि रंग श्रवहिरंति काले मार्गणं तत्राजन्योत्कृष्टानन्तानन्तं ग्राह्यम् ।" [त.रा.वा. ३ २८ ] | ।।" [ प.पु. ३ पृ. २७] ३. व.पु. ३ पृ. १६ २. यत्रानन्तं
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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