________________
२१६ गो, सा. जीवकाण्ड
गाथा १५५-१५६
द्वितीय पृथ्वो के नारकी (ज.थे.)) तृतीयपृथ्वी के नारवी (ज.श्रे.) है। चतुर्थपृथ्वी के नारकी (ज.थे.)। पंचमपृथ्वी के नारकी (ज.श्रे.)है। छठी पृथ्वी के नारकी (ज.श्रे.) और सातवीं पृथ्वी के नारकी (ज.श्रे.)हैं हैं। (सब अंक धात हैं।) सर्व नारकियों का प्रमाण घनांगूल के द्वितीय बर्गमूल से गुणित ज.श्रे. में से इन सबको घटाने पर प्रथम पृथ्वी के नारकी जीवों का प्रमाण प्राप्त होता है जो सर्व नारकी जीवों के प्रमाण से किचित् ऊन है। इसप्रकार सर्वनारकियों का तथा सातों पृथ्वियों के नारकियों का पृथक्-पृथक प्रमाण कहा गया है।
तिर्यचगति के जीवों का प्रमाण संसारी पंचक्खा, तप्पुण्णा तिगदिहीण्या कमसो । सामण्णा पंचिदी, पंचिदियपुरगतेरिक्खा ॥१५५।। छस्सयजोयणकदिहिव जगपदरंजोणिणीग परिमाणं ।
पुण्णूणा पंचक्खा, किरियप्रएपशिला ।१६।। गावार्थ -संसारी जीवराशि में से तीनों गतियों को जोवराशियों का प्रमाण घटाने पर - सामान्य तिर्यंच जीवों का प्रमाण प्राप्त होता है। सम्पूर्ण पंचेन्द्रिय जीवराशि में से तीनगतियों के
जीवों का प्रमाण कम कर देने पर पंचेन्द्रियतिथंच जीवों की संख्या प्राप्त होती है। समस्त पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीवों के प्रमाण में से तीन गतियों के पर्याप्त जीवों का प्रमाण घटाने पर पंचेन्द्रिय पर्याप्त तिर्थचों की संख्या प्राप्त हो जाती है। छह सौ योजन के वर्ग से भाजित जगत्प्रतर तिर्यवनियों का प्रमांग है। पंचेन्द्रियतिथंचों के प्रमाण में से पर्याप्त पंचेन्द्रियतियचों को संख्या घटाने पर उपलब्धगशि पंचेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्त तिर्यंचों का प्रमाण है ॥१५५-१५६५
विशेषार्थ--उपर्युक्त कथन को ठीक प्रकार से ग्रहण करने के लिए संसारी जीवों का प्रमाण, पंचेन्द्रिय जीवों का प्रमाण तथा पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीवों का प्रमाण जानना आवश्यक है। सर्व जीवगणि अनन्त है और अनन्त अनेक प्रकार का है---
'णाम ठवणा दधियं सस्सव गणणापदेसियमवंतं । एगो उभयादेसो विस्थारो सम्व भावो य॥८॥
नाम अनन्त, स्थापना अनन्त, द्रव्यानन्त, शाश्वतानन्त, गणनानन्त, अप्रदेशिकानन्त, एकानन्त. उभयानन्त, विस्तारानन्त, सर्वानन्त और भावानन्त । इस प्रकार यह ग्यारह प्रकार का अनन्त है ।
शङ्कर-इन ग्यारह प्रकार के अनन्तों में से किस अनन्त की अपेक्षा सर्व जीवराशि को अनन्त कहा गया है?
समाधान-गणनानन्त की अपेक्षा सर्व जीवराशि को अनन्त कहा गया है। गणनानन्त भो तोनप्रकार का है—परीतानन्त, युक्तानन्त गोर अनन्तानन्त । इन तीन प्रकार के
१. प. पु. ३ पृ. ११ ॥