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गाथा १४८
गतिमार्गमा/२७३ प्रतिभारवहन आदि अनेक प्रकार के दुःख सहते हैं ।" तियंचगति के दुःख प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं। मायाचारी के कारण तिर्यंचायु का वध कर जीव तिर्यचों में उत्पन्न होकर नाना प्रकार के दुःखों को सहता है ।।
तिर्यंचगति में तिर्यंचजीव द्रव्यप्रमाण से अनन्त हैं, काल की अपेक्षा अनन्तानन्य अवसर्पिणी और उत्सपिणियों से अपहृत नहीं होते हैं ।
शङ्का-तिपंच जीव अनन्तानन्त अवसर्पिणी और उत्सपिणियों से क्यों नहीं अपहृत होते ?
समाधान—क्योंकि यहाँ पर केवल अतीतकाल सम्बन्धी उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काल का ग्रहण किया गया है ।
तिर्यच पाँच प्रकार के होते हैं--सामान्यतियंच, पंचेन्द्रियतिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त, पंचेन्द्रिय तिर्यंचयोनिनी और पंचेन्द्रिय तिथंच अपर्याप्त (लब्ध्यपर्याप्त)। इनमें से सामान्य तिर्यंचों की संख्या का कथन ऊपर कर चुके हैं।
पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंचपर्याप्त, पंचेन्द्रिय तियंचयोनिनी, पंचेन्द्रियतिथंच अपर्याप्त असंख्यात हैं।
तिर्यंचगति से तिर्यंचजीव का अन्तर कम से कम क्षुद्भवग्रहण मात्र काल तक होता है, क्योंकि तियंचगति से निकलकर मनुष्य लब्ध्यपर्याप्तक में उत्पन्न हो कदलीधात युक्त क्षुद्रभवग्रहण मात्र काल तक रहकर पुन: तिर्यंचों में उत्पन्न हुए जीव के क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण अन्तर पाया जाता है । अधिक से अधिक सागरोपमशतपृथक्त्व काल तक तिर्यचगति से अन्तर पाया जाता है, क्योंकि तियंचजीव के तिर्यंचों में से निकलकर शेष गतियों में सागरोपमशतपृथवत्व काल से ऊपर ठहरने का अभाव है। किन्तु पंचेन्द्रिय तिर्यंच चतुष्क का उत्कृष्ट अन्तर असंख्यातपुद्गलपरिवर्तन प्रमाण अनन्तकाल होता है, क्योंकि विवक्षित गति से निकलकर एकेन्द्रिय व विकलेन्द्रिय आदि अविवक्षित गतियों में असंख्यात पुद्गल परिवर्तन काल तक परिभ्रमरण कर विवक्षित गति में उत्पन्न होने पर यह अन्तर काल गाया जाता है।
तिर्यंचों में पाँच गुणस्थान होते हैं --मिथ्याष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्याष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंग्रत । जिसप्रकार बद्धायुष्क असंयतसम्यग्दृष्टि और मासादनसम्पष्टि गुणस्थानबालों का तिर्यंचगति के अपर्याप्तकाल में सद्भाव सम्भव है, उसप्रकार सम्यग्मिथ्याष्टि और संयतासंयतों का तिर्यत्रगति के अपर्याप्तकाल में सद्भाव सम्भव नहीं है, क्योंकि अपर्याप्त काल के साथ सम्यग्मिध्यारष्टि व संयतासंयत का विरोध है। पंचेन्द्रिय तिर्यचों के चार भेदों में भी पाँच गुणस्थान होते हैं, किन्तु लब्ध्यपर्याप्तकों में एक मिथ्याष्टि गुणस्थान के अतिरिक्त अन्य गुणस्थान असम्भव हैं 10
१. "माया तैयंग्योनस्य"(त. सू. प्र. ६ सूत्र १६)। २. विशेष के लिए देखिए प. पु. ३ पृ. ३०-३१ । ३. ध. पु. ७ पृ. २५२ । ४. घ. पु. ७ पृ. १८६ । ५. ध. पु. ७ पृ. १६ । ६. घ. पु. १ पृ. २०७ । ७. घ. पु. १ पृ. २०८ ।
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