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________________ १८४/मो. सा. जीवकाण्ड गाथा १३२-१३३ हो जाने से अथवा तृतीय शुक्लध्यान के काल में प्राय ब.कायबल ये दो ही प्राण होते हैं, परन्तु कितने ही प्राचार्य द्रव्येन्द्रिय को पूर्णता की अपेक्षा दस प्राण कहते हैं, उनका ऐसा कहना घटित नहीं होता, क्योंकि सयोगीजिन के भावेन्द्रियाँ नहीं पाई जातीं। पाँचों इन्द्रियावरणकमो के क्षयोपशम को भावेन्द्रियों कहते हैं, किन्तु जिमका आधरणकर्म समूल नष्ट हो गया है, उनके वह क्षयोपशम नहीं होता। यदि प्राणों में द्रव्येन्द्रियों का ही ग्रहण किया जाये तो संज्ञीजीवों के अपर्याप्त काल में सातप्रारणों के स्थान पर कुल दो ही प्राण कहे जायेंगे, क्योंकि उनके द्रव्येन्द्रियों का प्रभाव होता है । अतः यह सिद्ध हुआ कि सयोगीजिन के चार अथवा दो ही प्रारण होते हैं।' अयोगीजिन के आयु नामक एक ही प्राण होता है। शङ्का --एक प्रायुप्रास होने का क्या कारण है ? समाधान---झानावरणकर्म के क्षयोपशम स्वरूप पांच इन्द्रियप्राण तो अयोगकेवली के हैं नहीं, क्योंकि ज्ञानावरणादि कर्मों का क्षय हो जाने पर क्षयोपशम का अभाव पाया जाता है | इसीप्रकार पानपान, भाषा और मनःप्रारण भी उनके नहीं हैं, क्योंकि पर्याप्तिजनित प्राण संज्ञा वाली शक्ति का उनके अभाव है। इसोप्रकार उनके कायवल नाम का प्राण भी नहीं है, क्योंकि उनके शरीर नामकर्मीदय जनित कर्म और नोकर्मों के प्रागमन का अभाव है। इसलिए प्रयोगकेवली के एक आयुप्राण ही होता है। उपचार का प्राश्रय लेकर एकमाण, छमारा अथवा सातप्राण भी होते हैं। यह काथन । अप्रधान अर्थात् गौरा है। 'जहाँ मुख्य का अभाव हो, किन्तु उसके कथन करने का निमित्त या प्रयोजन हो वहाँ पर उपचार किया जाता है। अयोगी जिन के मुख्य इन्द्रियों का तो अभाव है, क्योंकि वे ज्ञानावरण के क्षयोपशमस्वरूप हैं, किन्तु पंचेन्द्रियजाति नामकर्मोदय के कारण अयोगकेवली पंचेन्द्रिय हैं। इसलिए पाँच इन्द्रियप्राणों का उपचार बन जाता है । शरीरनामनाम का यद्यपि उदय नहीं है तथापि सत्त्व है और औदारिक शरीर भी है अतः कायबल प्रारण का भी उपचार किया जा सकता है । इस प्रकार पाँच इन्द्रियों के उपचार से एक आयुनाण और पाँच इन्द्रिय प्राण, छहप्रारणों का उपचार बन जाता है । इन छहप्रारणों में कायबल प्राण मिला देने से सात प्राणों का उपचार बन जाता है। इस प्रकार गोम्मटसार जीवकाण्ड में प्राणप्ररूपणा नामक चतुर्थ अधिकार पूर्ण हुप्रा । १. 'तम्हा सजोगिकेवलिस्स पारिपाया दो पाशा या ।" (4. पु. २ पृ. ४४४-४५ व पृ. ६५१) २. "पाउम पाणों एपको चेद" (प. पु. २ पृ. ४४५) ३. घ, पु. २ पृ. ४४५-४६ । ४. "मुख्याभावे सति प्रयोजने निमिसे घोपचारः प्रवर्तते ।।२१२।। (पालापपद्धति)।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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