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पर्याप्त / १६७
समाधान - श्री यतिवृषभाचार्य के उपदेशानुसार क्षीणकषायगुणस्थान के चरमसमय में सम्पूर्ण घातिया कर्मों की स्थिति समान नहीं होने से सभी केवली समुद्घात करके ही मुक्ति को प्राप्त होते हैं, परन्तु जिन आचार्यों के मतानुसार लोकपूरण समुद्घात करने वाले केवलियों की बीस संख्या का नियम है, उनके मतानुसार कितने ही केवली समुद्घात करते हैं और कितने ही नहीं करते हैं ।
शङ्का – कौन से केवली समुद्घात नहीं करते हैं ?
समाधान - जिनकी संसार व्यक्ति अर्थात् संसार में रहने का काल वेदनीय आदि तीन कर्मों की स्थिति के समान है वे समुद्घात नहीं करते, शेष केवली समुद्घात करते हैं । '
गाया १२६
शङ्का – अनिवृत्ति आदि परिणामों के समान रहने पर संसारव्यक्ति-स्थिति और शेष तीन कर्मों की स्थिति में विषमता क्यों रहती है ?
स्थिति
समाधान--- -नहीं क्योंकि संसार की यदि के कारणभूत अनिवृत्तिरूप परिणामों के समान रहने पर संसार को उसके अर्थात् तीन कर्मों की स्थिति के समान मान लेने मैं विरोध आता है ।
शङ्का - संसार के विच्छेद का क्या कारण है ?
समाधान- द्वादशाङ्ग का ज्ञान, उनमें तीव्रभक्ति, केवलिसमुद्घात और अनिवृत्तिरूप परिणाम ये सब संसार के विच्छेद के कारण हैं । परन्तु ये सब कारण समस्त जीवों में सम्भव नहीं हैं, क्योंकि दसपूर्व और नीपूर्वधारी जीवों का भी क्षपकश्रेणी पर चढ़ना देखा जाता है । ग्रतः वहाँ पर संसारव्यक्ति के समान कर्मस्थिति नहीं पायी जाती है। इस प्रकार ग्रन्तर्मुहूर्त में नियम से नाम को प्राप्त होने वाले पत्योपम के श्रसंख्यातवे भागप्रमाण या संख्यात ग्रावलीप्रमाण स्थितिकाण्डकों का विनाश करते हुए कितने ही जीव समुद्घात के बिना ही प्रायु के समान शेष कर्मों को कर लेते हैं तथा कितने ही जीव समुद्घात के द्वारा शेषकर्मों को प्रायु के समान करते हैं। परन्तु यह संसार का घात केवली में पहले सम्भव नहीं है, क्योंकि पहले स्थितिकाण्डक के घात के सभी जीवों के समान परिणाम पाये जाते हैं ।
शङ्का - जबकि परिणामों में कोई अतिशय नहीं पाया जाता है, अर्थात् सभी केबलियों के परिणाम समान होते हैं तो पीछे भी संसार का घात मत हो ?
समाधान- नहीं, क्योंकि वीतरागरूप परिणामों के समान रहने पर भी अन्तर्मुहूर्तप्रमाण श्रायुकर्म की अपेक्षा आत्मा के उत्पन्न हुए ग्रन्थ विशिष्ट परिणामों से संसार का घात बन जाता है ।
शङ्का - अन्य श्राचार्यों के द्वारा नहीं व्याख्यान किये गये इस अर्थ का इस प्रकार व्याख्यान करते हुए आप सूत्र के विरुद्ध जा रहे हैं, ऐसा क्यों न माना जाय ?
१. ध. पु. १ पृ. ३०१-३०२ ।
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