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________________ १६२/मो. सा. जीवकाण्ड गाथा १२१ उपयुक्त कथन को अंकसंष्टि द्वारा इसप्रकार समझा जा सकता है किसी जीव का जन्म ८ बजे हुआ, ८ बजकर २ मिनट पर आहारपर्याप्ति पूर्ण हुई, ८ बजकर २ मिनट १२ सेकिण्ड पर शरीरपर्याप्ति पूर्ण हुई। ८ बजकर २ मिनट २५ सेकण्ड पर इन्द्रिय पर्याप्ति पूर्ण हुई। 5 बजकर २ मिनट ४० सेकण्ड पर पानपान पर्याप्ति पूर्ण हुई 1 ८ बजकर २ मिनट ५६ सेकण्ड पर भाषापर्याप्ति पूर्ण हई और ८ बजकर ३ मिनट १४ सेकंण्ड पर मनःपर्याप्ति पूर्ण हुई। एक-दो समयों में पर्याप्ति पूर्ण नहीं होती यह बतलाने के लिए अन्तर्मुहूर्त का ग्रहण किया है। पर्याप्तियों को पूर्ण करने का जघन्य भी और उत्कृष्ट भी काल समान है। पर्याप्त व निवन्यपर्याप्त का काल पज्जत्तस्स य उदये, णियणियपज्जत्तिरिणविदो होदि । जाव सरीरमपुण्णं, खिम्वत्ति प्रपुण्णगो ताथ ॥१२१।। गाथार्थ-पर्याप्त नामकर्म का उदय होने पर अर्थात् जिस जीव के पर्याप्त नामकर्म का उदय होता है, वह अपने-अपने योग्य पर्याप्तियों को निष्पन्न करने वाला होता है। जब तक अर्थात् जितने काल तक शरीरपर्याप्ति पूर्ण नहीं होती तब तक यह जीव नित्यपर्याप्लक रहता है ।।१२१॥ विशेषार्थ---जिस जीव को सर्वपर्याप्तियाँ नियम से पूर्ण होंगी उस जीव के पर्याप्त नामकर्म का उदय होता है । पर्याप्त नामकर्म का उदय होने पर जब तक शरीरपर्याप्ति पूर्ण नहीं होती उतने काल तक अर्थात् आहार व शरीर दोनों पर्याप्तिकाल तक अथवा अन्तर्मुहूर्त काल तक यह जीव निर्वृ त्यपप्तिक रहता है । योग तीन प्रकार का है -उपपादयोग, एकान्तानुवृद्धयोग, परिणाम योग। उत्पन्न होने के प्रथम समय में उपपादयोग होता है। उत्पन्न होने के द्वितीय समय से लेकर शरीरपर्याप्ति से अपर्याप्त रहने के अन्तिम समय तक एकान्तानुवद्धियोग होता है। पर्याप्त होने के प्रथम समय से लेकर आगे सर्वत्र परिणामयोग होता है । निर्वृत्त्यपयोप्तकों के परिणामयोग नहीं होता। किन्तु एक मत यह भी है कि सर्वपर्याप्तियों के पूर्ण होने पर जीव पर्याप्त होता है । एक भी पर्याप्ति के अपूर्ण रहने पर अपर्याप्तकों में परिणामयोग नहीं होता। जो जीव नरकों के दुःखों से अत्यन्त पीड़ित होकर नरक से पाकर मनुष्यों में उत्पन्न हुआ है, उसके औदारिक मिश्रकाययोग का काल अल्प होता है, क्योंकि उस समय उसके योग की बहुलता देखी १. "एग-दो समए हि पज्जतीनो ए समारणेदि सि जागाबाई तोमुत्तगहणं कादं । पजानिसमायणकालो जहण्णो उक्कस्सनो वि अस्थि ।" घ. पु. १० पृ. २३६ । २. उप्पणाविदियसमयम्प डि जाच सरीरपज्जत्तीए अपज्जत्तय वचरिमसमभो ताद एगताणुवदि जीगो होदि । पज्जत्तमसमयप्पहन्दि उरि सम्वत्थ परिणाम जोगो चेव । णिवत्तिग्रपज्जत्तारण पत्निं परिणामजोगो । (घ. पु. १० पृ. ४२०-२१) ३. सव्वाहिं पज्जत्तीहि पज्जनयदो । एक्काए वि पउजत्तीए असमत्ताए पजप्तएम परिणामजोगो ण होदि । (4. पु. १. पृ. ५५) 1
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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