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१६०/गो. सा. जीवकाण्ड
गाथा ११९
शङ्का-पाँच पर्याप्तियाँ छह पर्याप्तियों के अन्तर्गत ही हैं इसलिए पृथकरूप से पाँच पर्याप्तियों का कथन करना निष्फल है।
समाधान-नहीं, किन्हीं जीवविशेषों में छहों पर्याप्तियां पायी जाती हैं और किन्हीं जीवों में पांच ही पर्याप्तियां पायी जाती हैं। इस बात को बतलाने के लिए गाथा में 'पंच' शब्द दिया गया है।
शङ्कर-वे पाँच पर्याप्तियाँ कौनसी हैं ?
समाधान-सनःपर्याप्ति के बिना शेन पनि पर्याप्लियो यहाँ ग्रहण की गई हैं।
वे पाँच पर्याप्तियां विकल अर्थात् द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीत्रों के होती हैं, क्योंकि माथा में 'बियल' शब्द के द्वारा विकल चतुष्क का ग्रहण होता है।
शङ्का-विकलेन्द्रियजीवों में भी मन है, क्योंकि मन का कार्य विज्ञान जो मनुष्यों में है. बह विकलेन्द्रिय जोवों में भी पाया जाता है ?
समाधान--यह बात निश्चय करने योग्य नहीं है, क्योंकि विकलेन्द्रियों में रहने वाला विज्ञान मन का कार्य है, यह बात प्रसिद्ध है।
शङ्का-मनुष्यों में जो विशेष ज्ञान होता है, वह मन का कार्य है, यह बात तो देखी जाती है ।
सभाधान-मनुष्यों का विशेष विज्ञान यदि मन का कार्य है तो रहो, क्योंकि वह मनुष्यों में देखा जाता है।
शङ्का--मनुष्यों में मन के कार्यरूप से स्वीकार किये गये विज्ञान के साथ विकलेन्द्रियों में होने बाले विज्ञान की ज्ञानसामान्य की अपेक्षा कोई विशेषता नहीं है, इसलिए यह अनुमान किया जाता है कि विकले न्द्रियों का विज्ञान भी मन से होता है।
समाधान--नहीं, क्योंकि भिन्न जाति में स्थित विज्ञान के साथ भिन्न जाति में स्थित विज्ञान की समानता नहीं बन सकती है। 'विकलेन्द्रियों के मन नहीं होता' यह आगम-वाक्य प्रत्यक्ष से बाधित नहीं होता, क्योंकि वहाँ पर प्रत्यक्ष की प्रवृत्ति ही नहीं होती।
शता--विकलेन्द्रियों के मन का अभाव है, यह बात किस प्रमाण से जानी जाती है ?
समाधान—प्रागमप्रमाण से जानी जाती है कि विकलेन्द्रियों के मन नहीं होता ।
शङ्का—आर्ष को प्रमाण कैसे माना जावे ?
समाधान--जैसे प्रत्यक्ष स्वभावतः प्रमाण है, उसी प्रकार आर्ष भी स्वभावतः प्रमाण है।
१. प. पु. १ पृ. ५१३ । २. प. पु. १ पृ. ३१४ ।