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________________ १४४/गो. सा. जीवकाण्ड गाया ६७-१०० निर्वृत्तिपर्याप्तक सूक्ष्मनिगोदजीब को जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है । गुणकार प्रावली का असंख्यातवाँ भाग है। १६. उसके ही अपर्यापलक के (सूक्ष्मनियोद नित्यपर्याप्तक के ही) उत्कृष्ट प्रवगाहना उससे विशेष अधिक है। यहाँ अपर्याप्तक से नित्यपर्याप्तक का ग्रहण किया गया है, क्योंकि किसी अन्य के साथ प्रत्यासत्ति नहीं है। विशेष का प्रमाग अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण है । आवला का असंख्यातों भाग उसका प्रतिभाग है, किन्तु किन्हीं प्राचार्यों के अभिप्राय से वह एल्योपम के प्रसंख्यातये भाग प्रमाण है। १३. उसकेही पर्याप्तक घी उत्कृष्ट प्रवगाहना उससे विशेष अधिक है । विशेष का प्रमाण अंगुल के असंख्यातवें भाग मात्र है। २०. उससे सूक्ष्म वायुकायिक पर्याप्तक की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है, गुणाकार पावली का असंख्यातवाँ भाग है। २१. उसके नित्यपर्याप्तक की उत्कृष्ट अवगाहना उससे विशेष अधिक है । विशेष का प्रमाण अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण है। २२. उसके पर्याप्तक की उत्कृष्ट अवगाहना उससे विशेष अधिक है । विशेष का प्रमाग अंगुल का असंख्यातवाँ भाग है। २३. उससे सूक्ष्मतेजकायिक निर्वतिपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना असंख्यातमुरणी है । गुणकार प्रावली का असंख्यातवा भाग है। २४. उसके ही अपर्याप्तक ( नित्यपर्याप्तक) की उत्कृष्ट अवगाहना उससे विशेष अधिक है, विशेष का प्रमाण अंगुल का असंख्यातवां भाग है। २५. उसके ही निर्वृतिपर्याप्तक की उत्कृष्ट अवगाहना उससे विशेष अधिक है । विशेष का प्रमाण अंगुल के असंख्यात गाय प्रमाण है। २६. उससे सूक्ष्म जलकायिक निर्वृत्तिपर्याप्तक की जघन्य अबगाहना असंख्यातनगी है, गुणकार आवली का असंख्यातवाँ भाग है। २७. उसके ही नित्यपर्याप्तक की उत्कृष्ट अवगाहना उससे विशेष अधिक है । विशेष का प्रमाण अंगुल का असंख्यातवाँ भाग है। २८. उसके निर्वृत्तिपर्याप्तक को उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है। विशेष का प्रमाण अंगुल का असंख्यातवाँ भाग है। २६. उससे सूक्ष्मपृथ्वीकायिक निर्वृत्तिपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है। गुणकार प्रावली का असंख्यातवाँ भाग है । ३०. उसके ही निर्व त्यपर्याप्तक की उत्कृष्ट अवगाहना उससे विशेष अधिक है। अधिक का प्रमाण अंगुल का असंख्यातवाँ भाग है। ३१. उसके ही निर्वृतिपर्याप्तक की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है। विशेष अधिक का प्रमाण अंगुल का असंख्यातवाँ भाग है। ३२. उससे बादरवायूकायिक निव'तिपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना असंख्यातगणी है। गणकार पल्योपम का असंख्यातवा भाग है। ३३. उसके ही नित्यपर्याप्तक को उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है। विशेष अधिक का प्रमाण अंगूल के असंख्यातवें भाग है। ३४, उसके ही निर्वत्तिपप्तिक की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है । विशेष अधिक का प्रमाण अंगुल असंख्यातवा भाग है। ३५. उससे बादरतेजकायिक नितिपयप्तिक की जघन्य अवगाहना असंख्यातगणी है। गुणकार पल्योपम का असंख्यातवा भाग है। ३६. उसके ही नित्य पर्याप्तक की उत्कृष्ट अवगाहना उससे विशेष अधिक है । विशेष अधिक का प्रमाण अंगुल का असंख्यातवाँ भाग है। ३७. उसके ही निर्वृत्तिपर्याप्तक की उत्कृष्ट अवगाहना उससे विशेष अधिक है । विशेष अधिक का प्रमाण मंगल का असंख्याता भाग है। ३८. उससे चादर जलकायिक निर्वत्तिपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है। गुणकार पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग है। ३६. उसके ही नित्यपर्याप्तक को उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है । विशेष अधिक का प्रमाण अंगुल का असंख्यातवाँ भाग है । ४०. उसके ही नितिपर्याप्तक की उत्कृष्ट अवगाहना विशेष अधिक है । विशेष अधिक का प्रमाण अंगुल का असंख्यातवाभाग है। ४१ उससे बादर पृथ्वीकायिक निर्वृत्तिपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना असंख्यागुणी है। गुणकार का प्रमाण पल्यापम का असंख्यातवाँ भाग है। ४२. उसके ही निवृत्त्यपप्तिक की उत्कृष्ट अवगाहना उससे विशेष अधिक है। विशेष अधिक का प्रमाण
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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