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________________ १३०/गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ८२-८३ जन्म" (२/११) सम्मृचन–'सं'-समन्तात अर्थात् ऊर्ध्व, अधः, तिर्यकरूप तीनों लोकों में ऊपर-नीचे-तिरछे सभी दिशाओं से शरीर के योग्य पुद्गल परमाणुओं का इकट्ठा होकर शरीर बनना सम्मूर्च्छन है। गर्भ और उपपादजन्म से विलक्षण सम्मूर्द्धनजन्म है। गर्भ- स्त्री के उदर अर्थात् गर्भाशय में शरीरपरिणति के कारणभूत शुक्र और शोणित के परस्पर गरण अर्थात् मिश्रण को गर्भ कहते हैं । अथवा माता के उदर द्वारा उपभुक्त के प्रात्मसात् करने को अर्थात् गरग करने को गर्भ कहते हैं। 'गर्भ' यह रूढ़ि शब्द है तथा जरायुज, अण्डज और पोतजादि जन्म का बाचक है । उपपाद–प्राप्त होकर जिसमें जीव हलन-चलन करता है उसे उपपाद जन्म कहते हैं। देवों में सम्पूट शय्या (सीप के आकार की शय्या) को और नरकों में उष्ट्रादि मुखाकार बिल-स्थान को उपेत्य-प्राप्त करके या आश्रय करके शरीररूप परिणमने योग्य पुद्गलस्कन्धों की प्राप्ति उपपाद है। 'उपपाद' यह रूढ़ि शब्द देव-नारकियों के जन्म का बाचक है। सम्मुर्छन, गर्भ और उपपाद जन्म के उत्पत्ति स्थान को योनि कहते हैं । योनि के यद्यपि ८४ लान भेद हैं, तथापि सचित्त आदि गुण विशेष की अपेक्षा उनके नौ भेद हो जाते हैं। सम्भूनर्छन, गर्भ, उपपादरूप जन्मविशेषों में से प्रत्येक को यथासम्भव सचित्तादि गुरायोनियां होती हैं। वे गुरायोनियां इस प्रकार है-"सचित्तशीतसंक्ताः सेतरा मिश्राश्चकशस्तथोनयः"३ सचित्त, शीत, संवृत तथा इतर अर्थात इनके प्रतिपक्षभूत अचित्त, उष्णा और वित्त तथा प्रत्येक के मिश्र अर्थात् सचित्ताचिस, शीतोष्ण और संवृतविवृत्त ये जन्म की योनियाँ है । प्रात्मा के चैतन्य विशेषरूप परिणाम को चित्त कहते हैं । जो गुद्गलपिण्ड उस चित्त के साथ वर्तन करते हैं अर्थात् रहते हैं वे सचित्त हैं । शीत, यह स्पर्शगुण का एक भेद है। शुक्लादि के समान यह द्रव्य और गुण दोनों का वाची है। अतः शीतस्पर्श गुरगवाला द्रव्य भी शीत कहलाता है अर्थात् बहुलशीतस्पर्शवाला पुद्गलद्रव्य शीत कहा गया है। जो भलेप्रकार का हो वह संवत है। यहाँ अन्तनिगूढ़ अवयव को अर्थात् जो देखने में न ग्रावे ऐसे अवयवरूप स्थान को संत कहते हैं। ये तीनों ही इतर-प्रतिपक्षी सहित हैं । इतर का अर्थ अन्य भी है। इनके साथ रहने वाले इतर-सेतर कहलाते हैं। वे इतर अचित्त, उष्ण और विवृत हैं । चेतनरहित पुद्गलपिंड अचित्त है । बहुलस्पर्शगुणवाला पुद्गल द्रव्य उष्ण है । भले प्रकार प्रकट अवयव विवृत है । उभयात्मक अर्थात् उभयरूप को मिश्र कहते हैं । यहाँ उभयगुरण से मिश्रित को मिथ कहा गया है । सचित्ताचित्त मिश्रित, शीतोष्णमिश्चित, संवृतविवृतमिश्रित । गाथा में 'पत्तेयं' शब्द का ग्रहण मिश्र में क्रम का ज्ञान कराने के लिए किया गया है जिससे यह ज्ञान हो कि सचित्त का मिश्रण अचित्त के साथ है, शरेतादि के साथ नहीं। इसी प्रकार शीतउष्ण और संवृत-विवृत मिश्रित हैं । शङ्का -- इस तरह तो योनि और जन्म में कोई भेद नहीं है । १. म.प्र. टीका के आधार से। २. त. सूत्र न. २ सूत्र ३२ । ३. स.सि., राजपातिक और मन्दप्रबोधिनी टीका के प्राचार से।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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