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________________ ११४/गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ६९ कर सकते ।। सिद्धों के ये सातों विशेषण परमतों की मान्यताओं के निषेध के लिए दिये गये हैं । जिन्होंने समस्त कर्मों का निराकरण कर दिया है, जिन्होंने बाह्य पदार्थों की अपेक्षा रहित, अनन्त, अनुपम, स्वाभाविक और प्रतिपक्षरहित सुख को प्राप्त कर लिया है, जो निर्लेप हैं, अचलस्वरूप को प्राप्त हैं, सम्पूर्ण अवगुणों से रहित हैं, सर्वगुरणों के निधान हैं, जिनका स्वदेह अर्थात् आत्मा का आकार चरमशरीर से कुछ न्यून है, जो कोश से निकले हुए बाण के विनिःसंग हैं और लोक के अग्नभाग में निवास करते हैं, व सिद्ध हैं । सर्वार्थ सिद्धिइन्द्रक विमान के ध्वजदण्ड से बारह योजन ऊपर जाकर पाटवीं पृथिवी स्थित है। आठवीं पृथिवी के ऊपर सात हजार पचास धनुष जाकर सिद्धों का आवास है। चार हजार धनुष का घनोदधिवातबलय, दो हजार धनुष का घनवातवलय, १५७५ धनुष में से ५२५ धनुष प्रमाण सिद्धों को अवगाहना घटाने पर (१५७५-५२५)=१०५० धनुष तनुवातवलय, इस प्रकार (४००० + २०००+१०५०) =७०५० धनुष ऊपर जाकर सिद्धभगवान का निवास है 1 सिद्धों की उत्कृष्ट अवगाहना पाँच के वर्ग से युक्त ५०० अर्थात् ५२५ धनुष और जघन्य अवगाहना सादेतीन हाथप्रमाण है 1५ सर्व सिद्धों की अवगाहना का प्रमाण कुछ कम चरमशरीर के प्रमाण है। एक सिद्धजीव से अबगाहित क्षेत्र के भीतर जघन्य, उत्कृष्ट और मध्यम प्रवगाहना से सहित अनन्तसिद्ध जीव होते हैं। मनुष्यलोक (ढाईद्वीप) प्रमाण स्थित तनुवातवलय के उपरिमभाग में सर्व सिद्धों के मस्तक सदृश होते हैं । गाथा के अन्त में 'सिद्ध' पद है। वे सिद्ध अञ्जनसिद्ध, पादुकासिद्ध, गुटिकासिद्ध, दिग्विजयसिन्च, खड्गसिद्ध आदि लौकिकसिद्धों से विलक्षण तथा सम्यक्त्वादि अष्टगुणों के अन्तर्भूत निर्नाम, निर्गोत्र, प्रमुर्तत्वादि अनन्तगृण लक्षरणवाले होते हैं । गाथा में सिद्धों के जो सात विशेषण दिये हैं वे अन्य मतों का निराकरण करने को दृष्टि से दिये गये हैं । अतः अब उसी को स्पष्ट करने के लिए आगे एक गाथा द्वारा कथन करते हैं सिद्धों के उक्त सात विशेषणों का प्रयोजन सवासिव संखो मक्कडि बुद्धो याइयो य येसेसी। ईसरमंडलिवंसरणविदूसरराष्ट्र कयं एवं ॥६६॥' गाथार्थ-सदाशिव, सांख्य, मस्करी (संन्यासी), बौद्ध, नैयायिक, वैशेषिक, ईश्वर, मंडलि इन दर्शनों अर्थात् मतों को दूषण देने के लिए (गाथा ६८ में) सिद्धों के विशेषण कहे गये हैं ।।६।। विशेषार्थ-सदाशिव मत वाले जीव को सदा मुक्त और कर्ममल से अस्पृष्ट शाश्वत मानते हैं । उसका निराकरण करने के लिए 'सिद्धभगवान पाटकों से रहित हैं' ऐसा कहा गया है । पूर्व में १, सकलकर्मविप्रमुक्तः परमात्मा सिद्धपरमेष्ठी ऊर्ध्वगमनस्वभावत्वाल्लोकानपर्यन्तमूर्ध्व गत्वा तत्रंब तिष्ठति ततो बहिर्गमनसहकारि-धर्मास्तिकायाभावात् न गच्छति । (सिवान्तचक्रवर्ती-श्रीमदभमचन्द्रसूरि कृत टोका) २. घ. पु. १. पृ. २०० । ३. ति. प. ८/६५२ । ४. ति. प. ६/३। ५. लि. प. ६/६1 ६. ति. प. ६/१। ७. ति. प. ६/१४-१५ । ८. पं. का. गा. ९३, जयसेनाचार्यकृत टीका । ६. यह गाथा थी माषचन्द्र विद्यदेव विरचित है।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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