SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 104
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गुणस्थान/७१ अधिक है। तृतीयकृष्टि का वेदककाल विशेष अधिक है। दूसरी कृष्टि का वेदककाल विशेष अधिक है। प्रथम कृष्टि का बेदककाल विशेष अधिक है । यहाँ सर्वत्र विशेष का प्रमाण स्व ष्टि-वेदककाल के संख्यातवें भाग है।' न उपशम व क्षपक श्रेणी सम्बन्धी क्रियाभेद--अश्वकर्णकरण, अपूर्वस्पर्धक ब बादरकृष्टि न क्रियाओं सम्बन्धी उपर्युक्त कथन क्षपकश्रेणी की अपेक्षा किया गया है । इतनी विशेषता है कि सपनामश्रेणो में अश्वकर्णकरण, अपूर्वस्पर्धकरण और बादरकृष्टिकरण नहीं होते, किन्तु लोभ वककाल के द्वितीय विभाग में पूर्वस्पर्धकों से प्रदेशपुज का अपकर्षण करके सबसे जघन्य लता समान अनुभाग वाये सत्र की विपक्ष मे गादिराग-पादिलो से अनन्तगुणी हीन सूक्ष्मटियों को करता है। इस द्वितीय विभाग का नाम कृष्टिकरणकाल है, क्योंकि यहां पर स्पर्धकगत अनुभाग का अपवर्तन कर कृष्टियों को करता है । अत: इस लोभवेदक काल के द्वितीय विभाग की कृष्टिकरणाबाल यह सार्थक संज्ञा है । जिस प्रकार क्षपक श्रेणी में (बादर) कृष्टियों को करता हुआ सभी पूर्व परमपूर्वस्पर्धकों का पूर्णरूप से अपवर्तन कर (बादर) कृष्टियों को ही स्थापित करता है, उस प्रकार हो सम्भद नहीं है, क्योंकि सभी पूर्वस्पर्धकों के अपने-अपने स्वरूप को न छोड़कर उस प्रकार अवस्थित भी हुए सब स्पर्धकों में से असंख्यातवें भाग प्रमाण द्रव्य का अपकर्षण कर एक स्पर्धक की वर्गणामों अनन्तवें भाग प्रमाण अनुभाग से सूक्ष्मकृष्टियों की रचना उपशम श्रेणी में करता है । तीवमन्द अनुभाग सम्बन्धी अल्पबहुत्व-तीव-मन्द अनुभाग की अपेक्षा जघन्यकृष्टि स्तोक है से दूसरी कृष्टि अनन्तगुणी है, उससे तीसरी कृष्टि अनन्तगुणी है । इस प्रकार अन्तिमकृष्टि पर्यन्त तन्तगुरिणत श्रेणी रूप से क्रम चालू रहता है। कृष्टिकरणकाल के अवसान की प्ररूपणा -कृष्टिकरणाकाल में प्रावली और प्रत्यावली के न रहने पर प्रागाल और प्रत्यागाल न्युच्छिन्न हो जाते हैं । प्रत्यावली में एक समय शेष रहने पर मन संज्वलन की जघन्य स्थितिउदीरणा होती है । उसी समय स्पर्धकगत लोभ सम्बन्धी सर्व प्रदेश उपशान्त हो जाता है, किन्तु कृष्टिगत प्रदेशज अभी भी अनुपशान्त रहता है, क्योंकि सूक्ष्मसम्पराय के काल में कृष्टियों की उपशामना देखी जाती है, यही अन्तिम समयवर्ती बादरसाम्परायिक मत है, क्योंकि यहाँ पर अनिवृत्तिकरणकाल का अन्त देखा जाता है । 1 इस प्रकार क्षपश्रेणी सम्बन्धी पूर्व-अपूर्वस्पर्धक व बादर-सूक्ष्मकृष्टि और उपशमश्रेणी वन्धी पूर्वस्पर्धक ब सूक्ष्मकृष्टि का कथन पूर्ण हुआ । __दसवें गुणस्थान-सूक्ष्मसाम्पराय का स्वरूप धुदक्कोसु भयवत्थं होदि जहा सुहमरायसंजुतं । एवं सुहमकसानो सुहमसरागोत्ति रणावध्यो ।। ५६ ॥ ३. ज.ध.पू.१३ ३१५ । ४. क. पा. ३७से८४६२, ज, व.पु.१३५.३०७ । " असासूत्र २५८३ ५. ज.घ. पु. १३ पृ. ३१८-३१६ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy