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________________ गाथा ५७-५८ गुणरथान/६६ तदनन्तर काल में मान की द्वितीय संग्रहकृष्टि से प्रदेशाग्र का अपकर्ष रण करके प्रथमस्थिति को करता है।' मान की वितीयकृष्टि को बेदन करने वाले के प्रथमस्थिति में जब एक समय अधिक श्रावली शेष रह जाता है, उस समय तीनों संज्वलन का स्थितिबन्ध एकमास और कुछ कम दस दिवस होता है तथा स्थितिसत्त्व दो वर्ष और कुछ कम पाठ मास रह जाता है। तदनन्तर समय में मान की तृतीयकृष्टि से प्रदेशाग्र को अपकर्षित करके प्रथमस्थिति को करता है और उसी विधि से मान की तृतीयकृष्टि को वेदन करने वाले को प्रथमस्थिति में एक समय अधिक प्रावलीकाल शेष रह जाता है, उस समय वह मान का चरमसमय वेदक होता है। तब तीनों संज्वलनों का स्थितिबन्ध एक मास और स्थितिसत्त्व दो वर्ष होता है 13 तदनन्तर समय में माया की प्रथम कृष्टि से प्रदेशाग्र का अपकर्षण कर प्रथमस्थिति को करता है और उसी विधि से माया को प्रथम कृष्टि को बेदन करने वाले की प्रथमस्थिति में एक समय अधिक प्रावलीकाल शेष रह जाता है, उस समय उन दोनों संज्वलनों का स्थितिबन्ध कुछ कम २५ दिवस और स्थितिसत्व एक वर्ष और कुछ कम पाठ मास होता है। तदनन्तर काल में माया को द्वितीयकृष्टि से प्रदेशाग्र का अपकर्षण करके प्रथमस्थिति को करता है । प्रथमस्थिति में एक समय अधिक आवली काल गेष रहने के समय दोनों संज्वलनों का स्थितिबन्ध कुछ कम बीस दिवस प्रमाण और स्थितिसत्त्व कुछ कम सोलह मास है। तदनन्तर काल में माया की ततीय कृष्टि से प्रदेशाग्र को अपषित करके प्रथम स्थिति को करता है। उस प्रथमस्थिति में एक समय अधिक प्रावली काल शेष रहने पर माया का चरमसम यवतों वेदक होता है 1 उस समय दोनों संज्वलनों का स्थितिबन्ध अर्धमास और स्थितिसत्त्व एक वर्ष है, शेष तीन धातिया को का स्थितिबन्ध मासपृथक्त्व तथा स्थितिसत्त्व संख्यातसहलवर्ष है; तथा प्रायु बिना शेष तीन अघातिया कर्मों का स्थितिबन्ध संख्यातवर्ष और स्थितिसत्त्व असंख्यात वर्ष है।' तदनन्तर काल में लोभ की प्रथम संग्रहकृष्टि से प्रदेशाग्र का अपकर्षण करके प्रथम स्थिति को करता है। लोभ की प्रथम स्थिति को वेदन करने वाले के जब एक समय अधिक प्रावली काल शेष रह जाता है तब लोभ का स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्त है और स्थितिसत्त्व भी अन्तर्मुहूर्त है, तीन घातिया कर्मों का स्थितिबन्ध दिवसपृथक्त्व होता है, शेष कर्मों का स्थितिबन्ध वर्षपृथक्त्व होता है। घातिया कर्मों का स्थितिसत्त्व संख्यात सहस्रवर्ष और तीन अघातिया का स्थितिसत्त्व असंख्यात बर्ष है। तत्पश्चात् अनन्तर काल में लोभ की द्वितीयकृष्टि से प्रदेशाग्र का अपकर्षणा करके प्रथमस्थिति को करता है। उसी समय में लोभ को द्वितीय और तृतीयकृष्टि के प्रदेशाग्र को सूक्ष्मसाम्परायिक कृष्टि रूप करता है जिनका अबस्थान लोभ की तृतीयकृष्टि के नीने है । संज्वलन लोभ कषाय के अनुभाग को बादर-साम्परायिक-कृष्टियों से भी अनन्तग गिगात १. क. पा. चूगिसूत्र १२०० । २. क. पा. चूमिासूत्र १२०२। ३. के. पा. चूणिसूत्र १२०४ से १२०८ । ४. क.पा. चुगिसूत्र १२०६ मे १२१२ पृ. ८६०। ५. क.पा. पूणिसूत्र १२१३ से १९१६ । ६. क.पा. चुणिमूत्र १२१७ से १२२४ । ७. क.पा. चूमिसूत्र १२२५ से १२३२। ६. क.पा. चूणिसूत्र १२३३ से १२३६ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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