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________________ परिही तिलक्खसोलस, सहस्स दोलय सत्तवीस हिया । कोसतिग अट्ठावीसं, धणुसय तेरंगुलद्धहियं ॥ ८ ॥ अर्थ - जंबुद्वीपका विष्कंभ एक लाख योजनका है. उसकी ( परिही ) परिधी (तिलक्ख सोलस सहस्स) तीन लाख शोले हजार (दोसय सत्तावीस हिया ) दोस्रो सत्ताईश योजन अधिक ( कोसतिग) तीन कोश ( सय) एकसो (अठ्ठाघीसं ) अठाइस ( धणु ) धनुष्य और (तेरंगुलवहियं ) सार्धत्रयोदशांगुल जंबुद्वीपकी जानना ॥ ८ ॥ (परिशिष्ट ) इस परिधीको जंबुद्वीपके विष्कंभ प्रमाणसे चतुर्थांश निकाल उससे गुणाकरे तब जंबुद्वीपका गणितपद ( क्षेत्रफल ) होता है उसकी संख्या नीचेकी गाथासें दिखाते है ।। भावार्थ - जंबुद्वीपका विष्कंभ एक लाख योजनका है. जिसकी परिधी "तीन लाख शोले हजार दोसो सत्ताईश योजन तीन कोष" एकसो अट्ठाईश धनुष साढावेरा अंगुल ( ३१६२२७ ) योजन ( ३ ) कोष ( १२८ ) धनुष्य (१३॥ ) अंगुल ) होती है ॥ ८ ॥ सत्तेवय कोडिसया, णउआ छप्पन्नसयसहस्साईं । चउणउयं च सहस्सा, सर्यादिवद्धं च साहियं ॥ ९ ॥ अर्थ – (य) जो ( सत्तेव) सात (सया ) शतानि ( सो ) ( कोटी) क्रोडोपरी ( णउआ ) निवे क्रोड "याने सातसें
SR No.090175
Book TitleJivvicharadiprakaransangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJindattsuri Gyanbhandar Surat
PublisherJindattsuri Gyanbhandar
Publication Year
Total Pages305
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size7 MB
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