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________________ ब गेदुहओ) वनस्पतिवरजके चार स्थावरको जघन्य और उत्कृष्ट ऐसे दो प्रकारे (अंगुलअसंखभागतणु) अंगुलके असंबख्यातमें भागे शरीरकी अवगाहना होति है ॥ ५ ॥ I सवेसिपिजहन्ना साहावियअंगुलस्ससंखसो । उक्कोसपणसयधणू नेरइयासत्तहत्यसुरा ॥ ६॥ है। (ससिपिजहन्ना ) सब दंडकोके विपे जघन्यसें (साहावियअंगुलस्सअसंखंसो) स्वाभाविक अंगुलके असंख्यातमे | भागे शरीर होते है (उक्कोसपणसयधणू) और उत्कृष्टी अवगाहना पांचसें धनुष्यकी (नेरइया) नारकीके जीवोंकी हैं। !(सत्तहत्थसुरा) और देवोंका उत्कृष्टा शरीरमान सात हाथका होता है ॥ ६ ॥ गष्भयतिरिसहस्सजोयण वणस्सईअहियजोयणसहस्सं । नरतेइंदितिगाऊ वेइंदियजोयणेवार ॥७॥ । (गष्भयतिरिसहस्सजोयण) गर्भजतियंचका शरीर एक हजार जोजनका है (वणस्सईअहियजोयणसहस्सं ) और वनस्पतिकायका शरीर एक हजार जोजनसें कुछ अधिक होते है (नरतेइंदितिगाऊ) मनुष्य और तेइंद्रिका शरीर तिन गाउका होता है (बेइंदियजोयणेबार ) और वेइंद्रिका शरीर बारह जोजनका है ॥७॥ जोयणमेगंचउरिदि देहमुच्चत्तणंसुएभणियं । वेउवियदेहपुण अंगुलसंखंसमारंभे ॥ ८॥ ॥ (जोयणमेगंचउरिदि) एक जोजन चौरंद्रिका (देहमुच्चत्तर्णसुएभणियं) शरीरका उंचपणा सूत्रमे कहा है (वेवि
SR No.090175
Book TitleJivvicharadiprakaransangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJindattsuri Gyanbhandar Surat
PublisherJindattsuri Gyanbhandar
Publication Year
Total Pages305
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size7 MB
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