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________________ G A4 जिणअजिणतित्थतित्था गिहिअन्नसलिंगधीनरनपुंसा । पत्तेअसयंबुद्धा बुद्धबोहिक्कणिक्काय ॥ ५५ ॥ (जिण) जिनसिद्ध १ ( अजिण) अजिमसिद्ध २ (तित्य ) तीर्थसिद्ध ३ (तित्था ) अतीर्थसिद्ध ४ (गिहि ) गृहीलिंगसिद्ध ५ (अन्न) अन्यलिंगेसिद्ध ६(सलिंग ) स्वलिंगसिद्ध ७ (थी ) स्त्रीलिंगसिद्ध ८ (नर) पुरुषलिंगसिद्ध ९ (नपुंसा) नपुंसकलिंगसिद्ध १० (पत्तेअ) प्रत्येकबुद्धसिद्ध ११ (सयंबुद्धा) स्वयंबुद्धसिद्ध १२ (बुद्धवोहि ) बुद्रबोधितसिद्ध है। हणिकाय, एनसिह और भनेकसिद्ध १५ यह सिद्धके पन्द्रह भेद संक्षेपसें कहा फिर विशेष दिखलाते है ॥५५॥ |जिणसिद्धाअरिहंता अजिणसिद्धायपुंडरियपमुहा । गणहारितित्थसिद्धा अतित्थसिद्धायमरुदेवी ॥५६॥ II (जिणसिद्धा) तीर्थकर होके मोक्ष गये वह नीर्थकरसिद्ध (अरिहंता) रिषभादि अरिहंतसिद्ध १ (अजिणसिद्धाय पुंडरियपमुहा) अजिनसिद्ध सामान्य केवली पुंडरिक गणधर आदि २ (गणहारितित्थसिद्धा) गणधर गौतमादि तीर्ष । | सिद्ध ३ (अतित्थसिद्धायमरुदेवी ) अतीर्थसिद्ध वह मरुदेवी ४ ॥ ५६ ॥ गिहिलिंगसिद्धभरहो वलकलचीरीयअन्नलिंगम्मि । साहुसलिंगसिद्धा थीसिद्धाचंदणापमुहा ॥५७॥ (गिहिलिंगसिद्ध) गृहीलिंग सिद्ध हुये (भरहो) वह भरतादि ५ (धलकलचीरीय) वल्कलचीरीयादि तापशके वेपमें जो सिद्ध हुये (अन्नलिंगम्मि) वह अन्यलिंग सिद्ध जानना ६ ( साहुसलिंगसिद्धा) साधुके वेपमें जो सिद्ध हुए । वह स्वलिंगसिद्ध ७ (थीसिद्धाचंदणापमुहा) स्त्रीके लिंगमें जो सिद्ध हुए वह चंदनवालादि ८॥ ५७ ।। * *
SR No.090175
Book TitleJivvicharadiprakaransangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJindattsuri Gyanbhandar Surat
PublisherJindattsuri Gyanbhandar
Publication Year
Total Pages305
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size7 MB
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