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________________ बार प्रकारे परिणमे छे. इहां कोइ प्रेरकनो योग नथी. वस्तुने मूल धर्मनो हेतु छे. एनुं स्वरूप पुरूं वचनगोचर नथी. अनुभव गम्य नथी. केमके श्रीठाणांगसूत्रनी टीका मध्ये श्रुतज्ञान वृद्धिना सात अंग छे तिहां प्रथम सूत्रअंग, वीजुं । नियुक्ति अंग, ३ भाष्यअंग, ४ चूर्णिवालो सूत्रादि सर्वना अर्थ कहे छे. ५ टीका व्याख्या निरंतर ए पांच अंग तो ग्रंथरूप छे. तथा छठो अंग परंपरारूप छे तथा सातमुं अंग अनुभव ए साते कारणे विनय सहित भणता सुणतां थकां, साचा अर्थ पामिने आत्मानु ज्ञान निर्मल थाय. श्री भगवतीसूत्रे "गाथा" सुत्तत्थो खलु पढमो वीओ नियुत्तिमिसिओ भणिओ, तइयो अ निरवसेसो, एस विहि होइ अणुओगे, ए पांच पर्याय कह्या ते सर्व द्रव्य मध्ये छे. _ विभाव पर्याय ते जीव तथा पुद्गल मध्येज छे, ते विभाव पर्याय जीयने नरनारकीपणुं पामq ते तथा पुद्गलनो व्यणुक त्र्यणुकादिक खंधनो मिलवू, अनंताणुक पर्यंत अनंतपुद्गल स्कंधरूप ते विभाव पर्याय कहिये. मेर्वाद्यनादिनित्यपर्यायाः चरमशरीरत्रिभागन्यूनावगाहनादयः सादिनित्यपर्यायाः सादिसान्तपर्याया भवशरीराध्यवसायादयः अनादिसान्तपर्याया भव्यत्वादयः तथा च निक्षेपाः सहजरूपा वस्तुनः पर्यायाः एवं चत्वारो वत्थुपज्जाया इति भाष्यवचनात् नामयुक्ते प्रति वस्तुनि निक्षेपचतुष्टयं युक्तम् उक्तं चानुयोगद्वारे जत्थ य जं जाणिज्जा, निम्खेवं निक्विवे निरवसेसं, जत्थवि य नो जाणिज्जा, चउक्कयं निविखवे तत्थ, ॥१॥ तत्र नामनिक्षेपः स्थापनानिक्षेपः
SR No.090175
Book TitleJivvicharadiprakaransangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJindattsuri Gyanbhandar Surat
PublisherJindattsuri Gyanbhandar
Publication Year
Total Pages305
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size7 MB
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