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________________ उदासीनता परिणामे करी सातकर्मनी स्थिति अनेक कोडाकोडीना थोकडा असंख्याता जे सत्तामां हता ते खपाये ने aise उणी एक कोडाकोडी राखे यथावृत्तिकरण आत्मा अनंतिवार करे पण ग्रंथिभेद करी शके नहीं ए करण ते गिरि नदीने विचें आब्युं पाषाण ते घंचना घोलनारूप चालवे करीने जेम सहेजे सुंहालो थाय अने कोइक आकार पकडे तेम जन्म मरणांदि दुःखने उद्वेगें अनाभोगथीज भववैरागे जीव यथाप्रवृत्तिकरण करे एहिज जीव कोइक रीतें वैराग्यें विचारे जे भवन्भ्रमण ते दुःख छे. ए संयोगवियोगादि असार छे पण कांइक ज्ञानानंदादि ते सार के एहवी गवेषणा करनारो जीव ते यथाप्रवृत्तिकरण करीने अपूर्वकरण करे. इहां कोइ पुछे जे भव्यने तो पलटण योग्यता के पण अभव्य जीव केम करे तेनुं उत्तर जे तीर्थंकरभक्तिमां जे देवतानी महिमा तथा लोक सन्मानादिक देखीने पुण्यनी वांछायें देवत्व | राज्यादिक लाभ इच्छायें इग्यार अंग तथा बाह्य पंच महाव्रतादि पामे पण तेने सम्यक्त्व न होव जे पुद्गलाभिलाषी छे तेने गुणस्पर्श न थाय उक्तं च महाभाग्ये | अर्हदादिविभूतिमतिशयवर्ती दृष्ट्वा धर्मादेवंविधसत्कारो देवत्वराज्यादयः प्राप्यंते इत्येवं समुत्पन्न बुद्धेरभव्यस्यापि देवनरेंद्रादिपदेहया निर्वाणश्रद्धा रहित कष्टानुष्ठानं किंचिदंगीकुर्वतो ज्ञानरूपस्य श्रुतसामायिकमात्रलाभेऽपि सम्यक्त्वादिलाभः श्रुतस्य न भवत्येवेति ॥ ए रीतें धारकुं. तथा अपूर्वकरण अने अनिवृत्तिकरणनो अधिकार जेम आगमसारमां लख्यो छे तेज प्रमाणे इहां पण जाणवो. इम त्रण करण करीने उपशम अथवा क्षयोपशम अथवा क्षायिक सम्यक्त्व जे पाम्यो अने आत्मप्रदेश वर्त्तमाने सम्यक् दर्शनगुणनो रोधक एहवो मिध्यात्व मोहप्रकृतिना विपाकोदयने टलये करीने जे सम्यक्दर्शन गुणनी प्रवृत्ति थाय तेथी
SR No.090175
Book TitleJivvicharadiprakaransangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJindattsuri Gyanbhandar Surat
PublisherJindattsuri Gyanbhandar
Publication Year
Total Pages305
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size7 MB
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