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________________ जिहां लगे आत्मानुं शुद्धस्वरूप चिदानंदघन ते साध्यमां नथी अने पुगलसुखनी आशायें विष, गरल, अन्योन्य। अनुष्ठान जे करवू ते संसारहेतु छे माटे साध्यसापेक्षपणे स्याद्वादश्नद्धाये साधन करवू एहिज मार्ग छे अने ए मार्गनी जे || प्रतीतरुचि सम्यक्त्व कहिये, ते सम्यक्त्व ग्रंथिभेद कस्या पामिये ते ग्रंथिभेद तो त्रण करण करे तो जडे ते त्रण करण || जीव करे तेवा सम्यक्दर्शन पामे ते त्रण करणमा पेहेलुं यथाप्रवृत्तिकरण, बीजं अपूर्वकरण, त्रीजु अनिवृत्तिकरण ए करण सर्व संज्ञी पचेन्द्रि करे तेमा प्रथम यथाप्रवृत्तिकरण ते भव्य तथा अभव्य पण करें कोईक जीव अनंतिवार करे | ते यथाप्रवृत्तिकरण- स्वरूप लखिये छये. ___ सर्वकर्मनी उत्कृष्टस्थितिना बांधनार जीवने संक्लेश घणो छे माटे यथाप्रवृत्तिकरण करे नही, उक्तंच विशेषावश्यके उकोसठिई न लभइ, भयणा एएसु पुबलद्धाए ॥ सबजहन्नठिइसुवि, न लम्भइ जेग पुवपडिबन्नो ॥१॥ माटे कर्मनी 5. उत्कृष्टस्थितिनो बांधनार जीव ते चार सामायिकनो लाभ न पामे अने जे जीव सात कर्मनी जघन्यस्थिति बांधे ते | |जीव तो गुणवंतज छे ए रीत छे माटे जेवारें एक कोडाकोडी सागरोपम पल्योपमने असंख्यातमें भागे घणी स्थिति] बांधतो होय ते यथाप्रवृत्तिकरण करे जे जीव कर्मक्षपणारूप शक्ति पाम्यो न हतो ते शक्ति पाम्यो तेने यथाप्रवृत्तिकरण कहिये उक्तं च भाष्ये येन अनादिसंसिद्धप्रकारेण प्रवृत्त कर्मक्षपणं क्रियते अनेनेति करण जीवपरिणाम एव उच्यते अनादिकालात् कर्मक्षपणप्रवृत्तावध्यवसायविद्रोपो यथाप्रवृत्तिकरणमित्यर्थः क्षयोपशमी चेतनावीर्य जे संसारनी असारता जाणे संसार दुःखरूप करी जाणे तेथी परिग्रह शरीरथी खरे उद्धेगें 20
SR No.090175
Book TitleJivvicharadiprakaransangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJindattsuri Gyanbhandar Surat
PublisherJindattsuri Gyanbhandar
Publication Year
Total Pages305
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size7 MB
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