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________________ छे तेमज जिनवरनाध्याने जिनप्रतिमा पूजतां लाभ थाय छे एम युक्ति करतां तथा आगमनी साखे पण जिनप्रतिमाने जिनसमान माने ते आराधक अने जे जिनप्रतिमाने न माने तेणे स्थापना निक्षेपो उथाप्यो अने स्थापना उथापी तो द्रव्य तथा भाव निक्षेपो थापना विना थाय नही माटे द्रव्य तथा भाव पण उथाप्यो एम त्रण निक्षेपा उथाप्या तेवारें सिद्धान्त उथाप्याज माटे जे जिनप्रतिमाने नहीं माने ते विराधक जाणवो ते स्थापना इतर अने यावत् कधिक ए वे भेदै छे. रे द्रव्य निक्षेपो कहे छे, जेनो नाम पण होय तथा आकार थापना गुण पण होय अने लक्षण होय पण आत्मोपयोग न मिले ते द्रव्य निक्षेपो जाणवो एटले अज्ञानी जीव ते जीव स्वरूपना उपयोग बिना द्रव्य जीव हे "अणुव ओगोद" इति अनुयोगद्वारवचनात् वली कं छे जे सिद्धान्त वांचतां पूछतां पद अक्षर मात्रा शुद्ध अर्थ करे छे अने गुरुमुखे सद्दहे छे ते पण शुद्ध निश्ों पोतानी सत्ता ओलख्या विना सर्व द्रव्य निक्षेषामां छे जे भाव विना द्रव्यपणो के ते पुण्यबंधनुं कारण छे पण मोक्षनुं कारण नधी एटले जे करणीरूप कष्ट तपस्या करे छे अने जीव अजीव पदार्थनी सत्ता ओलखी नथी तेने भगवती सूत्रमां अव्रती तथा अपञ्चरकाणी कह्यां छे तथा जे एकली बाह्य करणी करे छे अने पोते साधु कहेवाय छे ते मृषा वादी छे एम उत्तराध्ययन सूत्रमां कयुं छे " नमुणीरन्नवासेणं" एवचनें "नाणेणय मुणी होइ" एचचनथी जे ज्ञानवान ते मुनि छे अने जे अज्ञानी ते मिथ्यात्वी छे तथा कोइक गणितानुयोगना नरक देवताना वोल अथवा यति श्रावकनो आचार जाणीने कहे जे अमेज्ञानी छैये ते पण ज्ञानी नथी पण जे द्रव्य गुण
SR No.090175
Book TitleJivvicharadiprakaransangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJindattsuri Gyanbhandar Surat
PublisherJindattsuri Gyanbhandar
Publication Year
Total Pages305
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size7 MB
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