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________________ २३२ गद्यचिन्तामणि [ १५२ जीवंधरस्थमहावंशतया महासत्त्वतया महामृत्तथा महोन्नतितया पात्मानमनुयुर्व-तं कमपि पर्यतं तदखर्वगर्वनिर्वासनाय निवेशयितुमिव निजाघ्रियुगमस्य शिरसि सिंहपोत इव शिलाविभङ्गन साहंकार: समविरह्य महीभृतस्तस्य मणिमकुटायमानं जिनपतिसदनम्', पिपासातुर इव धाराबन्धमादरान्धः समासाद्य, सद्यः संफुल्लमल्लिकावकुलमालतीप्रमुखप्रफुल्लगुच्छ: पूजाइमर्हन्तमतिभक्तिरभिपूज्य, ५ पुनरपि तरणतरणिरिव गीर्वाणगिरि प्रकृष्टमनोरथः प्रदक्षिणं भ्रमन्, त प्रत्यया जिनशासन रक्षियक्षि देवतया सादरपादितकशिपुः, ततो विनिर्गत्य विश्वतः शश्वदपपादिततरुणो चरणयावकरससंपर्क गम्यूतिमा कोशष्ट्यप्रमितं गत्वा तत्रैव महावंशतया उच्च कुलत या पक्षे महावेगुसहिततया, महासत्वतया विपुलपराकमतया पक्षे वृहदाकारजाबसहितत्वेन महीभृत्तया राजतया पक्षे पृथिवीधरस्बेन, महोन्नतितया च प्रचुरोदायतया च पक्षे महोत्तुगतया च आस्मानं स्वम् अनुकुर्वन्तं कमपि पर्वत शैलं तस्य पर्वतस्य १० योऽखों गवा भूयिष्टोऽहंकार-तस्य निर्वासनाय दूरीकरणाय अस्प शिरसि मस्तकं पक्षे शिखरे निजाघ्रियुगं स्वकीयचरणयुगलं निवेशयितुमित्र स्थापयितुमिव सिंहपात इव मृगेन्द्रमाणवक इव साहंकारः सगर्व: शिलाविमलेन शिलाखण्डेन समधिहह्म तस्य महीभृतः पर्वतस्य पक्षे राजः मणिमकुटायमान सममालिबदावरत् जिनपतिसदनं जिनेन्द्रमन्दिरम् पिपासातुर उदन्यापीडितो धाराबन्धमिव जलाशयमिव आदरान्धः सन् समासाद्य लब्ध्वा सद्यो झटिति संफुल्लानि बिलसितानि यानि मल्लिकाबकु र मालतीप्रमुखफुल्लानि १५ तेषां गुच्छैः स्तयकैः पूजाह सपर्यायोग्यम् अर्हन्तं जिनेन्द्रम् अतिभक्तिः प्रगाढभक्तियुक्तः सन् अमिपूज्य पूजयित्वा पुनरपि पूजानन्तरं तरुणतरणिर्मध्याह्नमार्तण्डो गीर्वाणगिरिमिव सुमरुमिव प्रकृष्टमनोरथः श्रेष्ठाभिप्रायः प्रदक्षिणं भ्रमन् परिकाम्यन् तत्रत्यया तत्रभवया जिनशासनरक्षिणी या यक्षिदेवता तया सादरं ससम्मानं यथा स्यात्तथा संपादितः कशिपूर्वस्वाच्छादने यस्य तथाभूतः, ततो जिनपतिसदनतो विनिर्गत्य वित्रतः सर्वत: शश्वद् निरन्तरम् उपपादितस्य तरुणीचरणयावकरसम्य युवतिपादालतकस्य संपण -- ------- २० बड़े वाँसोंसे युक्त होने के कारण ( पक्षमें उच्चकुलीन होनेसे ) महासत्वतया--अत्यधिक जीव जन्तुओंसे सहित होनेके कारण (पक्षमें अत्यन्त शक्तिशाली होनेसे) महीभृत्तया-पृथिवीको धारण करने के कारण (पक्ष में पृथिवीका पालन करनेसे और महोन्नतितथा-अत्यधिक ऊँचाई के कारण ( पक्ष में अत्यधिक उदार होनेसे ) जीवन्धर स्वामीका अनुकरण कर रहा था । उस पर्वतका बहुत भारी अहंकार दूर करने के लिए ही मानो उसके सिरपर-शिखरपर २५ अपना पैर रखने के उद्देश्यसे वे उसपर उस प्रकार चढ़ गये जिस प्रकार कि अहंकारसे युक्त सिंह का बच्चा चट्टानों के खण्डोंपर पैर रखता हुआ जा चढ़ता है। ऊपर चढ़कर उन्होंने उस पर्वतरूपी राजाके मणिमय मुकुट के समान आचरण करनेवाला एक जिनमन्दिर देखा। जिस प्रकार प्याससे पीडित मनुष्य बड़े आदरसे जलाशयके पास पहुँचता है उसी प्रकार जीवन्धर स्वामी भी आदरसे अन्ध होते हुए उस जिनमन्दिर के पास पहुँचे। उन्होंने तीत्र ३० भक्तिसे युक्त हो शीघ्र ही विकसित जुही, मौलश्री तथा मालती आदि प्रमुख-प्रमुख फूलोंके गुच्छोंसे पूजाके योग्य आहेन्त भगवानकी पूजा की। और मध्याह्नका सूर्य जिस प्रकार सुमेकपर्वतकी प्रदक्षिणा देता है. उसी प्रकार उन्होंने उन्नम मनोरथोंसे युक्त हो उक्त मन्दिरकी बारबार प्रदक्षिणा दी। उस मन्दिर में जिनशासनकी रक्षा करनेवाली जो यक्षा देवी रहती थी उसने उन्हें आदरपूर्वक वस्त्र तथा भोजन प्रदान किया। यहाँ से निकलकर वे उस पल्लव १. क० ख० ग० जिनसदनम् ।
SR No.090172
Book TitleGadyachintamani
Original Sutra AuthorVadibhsinhsuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1968
Total Pages495
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size20 MB
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