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________________ शस्त्र और सैन्य नहीं लड़त, ललाट का तेज लड़ता है, ऊर्ध्वरेता वीर्य लड़ता है।" ____ "पहेली न बुझाओ बेटा, यह संकटकाल है। खेल नहीं।" ___'पहेली नहीं, यह पहल है, राजन् ! कहीं से पहल करनी होगी, तभी तो वैर और हिंसा का दुश्चक्र टूटेगा। शस्त्रवल और बाहुबल से बड़ा, एक और भी बल है। वही सच्चा और अन्तिम बल है। वह निर्णायक हो सकता है। उसके इस ओर निर्णय सम्भव नहीं। मैं अधूरी बिजय से तुष्ट नहीं, अन्तिम बिजय चाहता हूँ, महाराज !!" "खेल का समय नहीं, कुमार। संकट से खेला नहीं जाता। अवसर की गम्भीरता को समझो।" । ___ "संकट को गम्भीर मानना, भयभीत होना है। भय से भय का निवारण सम्भव नहीं। अभय होकर उसमें कूदे, कि भय गायब। और वह खेल से ही सम्भव है, युद्ध से नहीं !..." "पाश्वंकुमार...!" "देर हो रही है, राजन्, क्षमा करे । सेनापति, रणधाध बन्द हों, सेनाएँ लौट जाएँ।" और घोड़ी ही देर में चारों ओर, एक मुक्त, शान्त नीरवता व्याप गयी।... ...और जाने कब, पार्श्वकुमार अकेले, कवच-शिरस्त्राण्यांवहीन, निःशस्त्र, विद्युत् वेग से, अपने 'महाकाल' मामा अश्व पर आरूढ़, कुशस्थल की ओर उड़े जा रहे थे। ....एक कड़कती बिजली जैसे एकाएक कलिंग के सैन्यशिविरों को चीरती हुई निकल गयी। एक छलाँग में 'महाकाल' का अश्वारोही, त्रिखण्डी रथ पर आरूढ़ यवनराज के मस्तक को लौंधकर, कुशास्थल के दुर्ग-तोरण पर 32 : एक और नीलांजना
SR No.090168
Book TitleEk aur Nilanjana
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVirendrakumar Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages156
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size2 MB
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