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________________ ( १६१ ) जिन आतम अच्चा ॥ टेक ॥ ज्ञान ध्यान में सावधान है, विषय भोगमें कच्चा वे ॥ ज्ञाता ॥ १ ॥ मिथ्या कथन सुननिको बाहेरा, जैन वैनमें मच्चा वे ॥ ज्ञाता ॥ २ ॥ मूढ़निसेती मुख नहिं बोलै, प्रभुके आगे नच्चा वे ॥ ज्ञाता ॥ ३ ॥ 'द्यानत' धरमीको यों चाहै, गाय चहै ज्यों बच्चा वे ॥ ज्ञाता. ॥ ४ ॥ ज्ञाता सोई सच्चा वे , वह ही सच्चा ज्ञाता सुशोभित होता जिसने अपनी आत्मा की, स्व की पूजा की हैं, उसका सम्मान किया हैं, उसको जाना है। वह ज्ञान व ध्यान में पूरा सचेत हैं, सावधान है। किन्तु विषय-भोग आदि में कच्चा है अर्थात् उनके प्रति विरक्त उदासीन है। वह मिथ्या कथन सुनने के लिए बहरे के समान है अर्थात् सुनकर भी नहीं सुनता है । परन्तु जिनवाणी सुनने में वह अत्यन्त उत्सुक व तत्पर है। मूर्खो के आगे वह कुछ भी नहीं बोलता, मौन रहता है । परन्तु प्रभु के सम्मुख वह नृत्य करता है, नाचता है। द्यानतराय कहते हैं कि वह धर्मात्मा के प्रति साधर्मी भ्रातृत्व भाव, वात्सल्य भाव रखता हैं - प्रेम रखता है, जैसे कि गाय अपने बच्चे के प्रति वात्सल्य भाव रखती है। अच्चा पूजी, सम्मान । १८८ T द्यानत भजन सौरभ
SR No.090167
Book TitleDyanat Bhajan Saurabh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTarachandra Jain
PublisherJain Vidyasansthan Rajkot
Publication Year
Total Pages430
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Devotion, & Poem
File Size5 MB
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