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________________ वुक्कंति अध्ययन उ. गोयमा !जहण्णेणं एगं समयं, उक्कोसेणं संखेज्जा मासा। प. ११. आरणदेवाणं भंते ! केवइयं कालं विरहिया उववाएणं पण्णत्ता? उ. गोयमा ! जहण्णेणं एगं समयं, उक्कोसेणं संखेज्जा वासा। प. १२. अच्चुयदेवाणं भंते ! केवइयं कालं विरहिया उववाएणं पण्णत्ता? उ. गोयमा ! जहण्णेणं एगं समयं, उक्कोसेणं संखेज्जा वासा। प. १३. हेट्ठिमगेवेज्जाणं भंते ! केवइयं कालं विरहिया उववाएणं पण्णत्ता? उ. गोयमा !जहण्णेणं एगं समयं, उक्कोसेणं संखेज्जाई वाससयाइं। प. १४. मज्झिमगेवेज्जाणं भंते ! केवइयं काल विरहिया उववाएणं पण्णत्ता? उ. गोयमा ! जहण्णेणं एगं समयं, उक्कोसेणं संखेज्जाइं वाससहस्साई। प. १५. उवरिमगेवेज्जगदेवाणं भंते ! केवइयं कालं विरहिया उववाएणं पण्णत्ता? उ. गोयमा !जहण्णेणं एगं समयं, उक्कोसेणं संखेज्जाइं वाससयसहस्साई। प. १६. विजय-वेजयंत-जयंता पराजियदेवाणं भंते ! केवइयं कालं विरहिया उववाएणं पण्णत्ता? उ. गोयमा !जहण्णेणं एगं समयं, उक्कोसेणं असंखेज्जं कालं। प. १७. सव्वट्ठसिद्धगदेवाणं भंते ! केवइयं कालं विरहिया उववाएणं पण्णत्ता? उ. गोयमा ! जहण्णेणं एगं समयं, उक्कोसेणं पलिओवमस्स संखेज्जइभाग।' ___-पण्ण. प.६, सु.५६९-६०५ २०. चउवीसदंडएसु दिट्ठत पुरस्सरं गइआई पडुच्च उप्पत्ति परूवणंप. नेरइयाणं भंते ! कहं उववज्जति? उ. गोयमा ! से जहाणामए पवए पवमाणे अज्झवसाणनिव्वत्तिएणं करणोवाएणं सेयकालं तं ठाणं विप्पजहित्ता पुरिमं ठाणं उवसंपज्जित्ताणं विहरइ, एवामेव ते वि जीवा पवओविव पवमाणा अज्झवसाणनिव्वत्तिएणं करणोवाएणं सेयकालं तं भवं विप्पजहित्ता पुरिमं भवं उवसंपज्जित्ताणं विहरति। प. तेसि णं भंते ! कहं सीहा गई? कहं सीहे गइविसएपण्णत्ते? - १४६३ १४६३) उ. गौतम ! जघन्य एक समय, उत्कृष्ट संख्यात मास तक। प्र. ११. भंते ! आरणदेव कितने काल तक उपपात से विरहित कहे गए हैं? उ. गौतम ! जघन्य एक समय, उत्कृष्ट संख्यात वर्ष। प्र. १२. भंते ! अच्युतदेव कितने काल तक उपपात से विरहित कहे गए हैं? उ. गौतम ! वे जघन्य एक समय, उत्कृष्ट संख्यात वर्ष । प्र. १३. भंते ! अधस्तन ग्रैवेयक देव कितने काल तक उपपात से विरहित कहे गए हैं? उ. गौतम ! जघन्य एक समय, उत्कृष्ट संख्यात सौ वर्ष तक। प्र. १४. भंते ! मध्यम ग्रैवेयक देव कितने काल तक उपपात से विरहित कहे गए हैं? उ. गौतम ! जघन्य एक समय, उत्कृष्ट संख्यात हजार वर्ष तक। प्र. १५. भंते ! उपरिम ग्रैवेयक देव कितने काल तक उपपात से विरहित कहे गए हैं? उ. गौतम ! जघन्य एक समय, ___उत्कृष्ट संख्यात लाख वर्ष तक। प्र. १६. भंते ! विजय, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित देव कितने काल तक उपपात से विरहित कहे गए हैं ? उ. गौतम ! जघन्य एक समय, उत्कृष्ट असंख्यात काल तक। प्र. १७. भंते ! सर्वार्थसिद्ध देव कितने काल तक उपपात से विरहित कहे गए हैं? उ. गौतम ! जघन्य एक समय, उत्कृष्ट पल्योपम के संख्यातवें भाग तक उपपात से विरहित कहे गए हैं। २०. चौबीस दंडकों में दृष्टान्त पूर्वक गति आदि की अपेक्षा उत्पत्ति का प्ररूपणप्र. दं.१. भंते ! नैरयिक जीव कैसे उत्पन्न होते हैं ? उ. गौतम ! जैसे कोई कूदने वाला पुरुष कूदता हुआ अध्यवसायनिर्वर्तित क्रिया साधन द्वारा उस स्थान को छोड़कर भविष्यकाल में अगले स्थान को प्राप्त करता है, वैसे ही जीव भी कूदने वाले की तरह कूदते हुए अध्यवसायनिर्वर्तित क्रिया साधन (कर्मों) द्वारा पूर्व भव को छोड़कर भविष्यकाल में आगामी भव को प्राप्त कर उत्पन्न होते हैं। प्र. भंते ! उन (नारक) जीवों की शीघ्र गति कैसी है? उनकी शीघ्रगति का विषय किस प्रकार का कहा गया है? १. सम.सम.सु.१५४(८)
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
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