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________________ कर्म अध्ययन १. एगिंदियनिव्वत्तिए, २. बेइंदियनिव्वत्तिए, ३. तेइंदिय निव्वत्तिए, ४. चउरिंदिय निव्वत्तिए, ५. पंचेंदिय निव्वत्तिए। एवं उवचिण-बंध-उदीरण-वेयण तह णिज्जरणं चेव। -ठाणं अ.५, उ.३, सु.४७३ जीवाणं छट्ठाणनिव्वत्तिए पोग्गले पावकम्मत्ताए चिणिंसुवा, चिणंति वा, चिणिस्संति वा,तं जहा१. पुढविकाइय निव्वत्तिए २. आउकाइय निव्वत्तिए, ३. तेउकाइय निव्वत्तिए, ४. वाउकाइय निव्यत्तिए, ५. वणस्सइकाइय निव्वत्तिए, ६. तसकाइय निव्वत्तिए। एवं उवचिण-बंध-उदीरण-वेयण तह निज्जरणंचेव। -ठाणं अ.६,सु.५४० जीवाणं सत्तट्ठाणनिव्वत्तिए पोग्गले पावकम्मत्ताए चिणिंसुवा, चिणंति वा, चिणिस्संति वा,तं जहा१. नेरइय निव्वत्तिए, २. तिरिक्खजोणिय णिव्वत्तिए, ३. तिरिक्खजोणिणी णिव्वत्तिए, ४. मणुस्स णिव्वत्तिए, ५. मणुस्सी णिव्वत्तिए, ६. देव णिव्वत्तिए, ७. देवी णिव्वत्तिए। एवं उवचिण-बंध-उदीरण-वेयण तह निज्जरणं चेव। -ठाणं. अ.७.सु. ५९२ जीवा णं अट्ठठाण निव्वत्तिए पोग्गले पावकम्मत्ताए चिणिंसु वा, चिणंति वा, चिणिस्संति वा, तं जहा१. पढमसमय-नेरइयनिव्वत्तिए २. अपढमसमय-नेरइयनिव्वत्तिए, ३. पढमसमय तिरियनिव्वत्तिए, ४. अपढमसमय तिरिय निव्वत्तिए, ५. पढमसमय मणुयनिव्वत्तिए, ६. अपढमसमय मणुयनिव्वत्तिए, ७. पढमसमय देवनिव्वत्तिए, ८. अपढमसमय-देवनिव्वत्तिए, एवं उवचिण-बंध-उदीरण-वेयण तह निज्जरणं चेव। -ठाणं.अ.८,सु.६६० जीवाणं णवट्ठाणनिव्वत्तिए पोग्गले पावकम्मत्ताए चिणिंसुवा, चिणंति वा, चिणिस्संति वा,तं जहा१. पुढविकाइय निव्वत्तिए, २. आउकाइय निव्वत्तिए, ३. तेउकाइय निव्वत्तिए, ४. वाउकाइय निव्यत्तिए, ५. वणस्सइकाइय निव्वत्तिए, ६. बेइंदिय निव्वत्तिए, ७. तेइंदिय निव्वत्तिए, ८. चउरिंदिय निव्वत्तिए, ९. पंचेंदिय निव्वत्तिए। एवं उवचिण-बंध-उदीरण-वेयण तह निज्जरणं चेव। -ठाणं.अ.९,सु.७०२ जीवाणं दसट्ठाणनिव्वत्तिए पोग्गले पावकम्मत्ताए चिणिंसुवा, चिणंति वा, चिणिस्संति वा,तं जहा१. पढमसमय एगिंदिय निव्वत्तिए, २. अपढमसमय एगिंदिय निव्वत्तिए, ११०३ १. एकेन्द्रियनिर्वर्तित, २. द्वीन्द्रियनिर्वर्तित, ३. त्रीन्द्रियनिर्वर्तित, ४. चतुरिन्द्रियनिर्वर्तित, ५. पंचेन्द्रियनिर्वर्तित। इसी प्रकार उपचय, बंध, उदीरण, वेदन और निर्जरण किया है, करते हैं और करेंगे कहना चाहिए। जीवों ने छह स्थान निर्वर्तित पुद्गलों का पापकर्म के रूप में चय किया है, करते हैं और करेंगे, यथा१. पृथ्वीकायनिर्वर्तित, २. अकायनिर्वर्तित, ३. तेजस्कायनिवर्तित, ४. वायुकायनिवर्तित, ५. वनस्पतिकायनिर्वर्तित, ६. त्रसकायनिर्वर्तित। इसी प्रकार उपचय, बंध, उदीरण, वेदन और निर्जरण किया है, करते हैं और करेंगे कहना चाहिए। जीवों ने सात स्थानों से निर्वर्तित पुद्गलों का, पापकर्म के रूप में, चय किया है, करते हैं और करेंगे, यथा१. नैरयिक निर्वर्तित, २. तिर्यक्योनिक निर्वर्तित, ३. तिर्यक्योनिकी निर्वर्तित, ४. मनुष्य निर्वर्तित, ५. मानुषी निर्वर्तित, ६. देव निर्वर्तित, ७. देवी निर्वर्तित। इसी प्रकार उपचय, बंध, उदीरण, वेदन और निर्जरण किया है, करते हैं, और करेंगे कहना चाहिए। जीवों ने आठ स्थानों से निर्वर्तित पुद्गलों का पापकर्म के रूप में चय किया है, करते हैं और करेंगे, यथा१. प्रथमसमय नैरयिकनिर्वर्तित २. अप्रथमसमय नैरयिकनिर्वर्तित, ३. प्रथमसमय तिर्यञ्चनिर्वर्तित, ४. अप्रथमसमय तिर्यञ्चनिर्वर्तित, ५. प्रथमसमय मनुष्यनिर्वर्तित, ६. अप्रथमसमय मनुष्यनिर्वर्तित, ७. प्रथमसमय देवनिर्वर्तित, ८. अप्रथमसमय देवनिर्वर्तित। इसी प्रकार उपचय, बन्ध, उदीरण, वेदन और निर्जरण किया है, करते हैं और करेंगे कहना चाहिए। जीवों ने नौ स्थानों से निर्वर्तित पुद्गलों का पापकर्म के रूप में चय किया है, करते हैं और करेंगे, यथा१. पृथ्वीकाय निर्वर्तित, २. अप्काय निर्वर्तित, ३. तेजस्काय निर्वर्तित, ४. वायुकाय निर्वर्तित, ५. वनस्पतिकाय निर्वर्तित, ६. द्वीन्द्रिय निर्वर्तित, ७. त्रीन्द्रिय निर्वर्तित, ८. चतुरिन्द्रिय निर्वर्तित, ९. पंचेन्द्रिय निर्वर्तित, इसी प्रकार उपचय, बन्ध, उदीरण, वेदन और निर्जरण किया है, करते हैं और करेंगे कहना चाहिए। जीवों ने दस स्थानों से निर्वर्तित पुद्गलों का पापकर्म के रूप में चय किया है, करते हैं और करेंगे, यथा१. प्रथम समय एकेन्द्रिय निर्वर्तित, २. अप्रथ मसमय एकेन्द्रिय निर्वर्तित,
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
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