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________________ १०१७ आश्रव अध्ययन तिलं तिलं चेव छिज्जमाणा सरीरविकिंत-लोहिओवलित्ता कागणि-मंसाणि-खावियंता। पावा खर-करसएहिं तालिज्जमाणदेहा, वातिकरनरनारीसंपरिवुडा पेच्छिज्जंता य नगरजणेण वज्झनेवत्थिया पणिज्जति नयरमज्झेण किवण-कलुणा, अत्ताणा असरणा अणाहा अबंधवा बंधु-विप्पहीणा विपिक्खिता, दिसोदिसिं मरणभयुव्विग्गा, आघायण-पडिदुवार-संपाविया अधन्ना सूलग्ग-विलग्ग-भिन्नदेहा। ते य तत्थ कीरंति परिकप्पियंगमंगा। उल्लविज्जति रुक्खसालासु केइ कलुणाई विलवमाणा। अवरे चउरंगधणिय बद्धा। पव्ययकडा पमुच्चंते दूरपाय-बहुविसमपत्थरसहा। अन्ने य गयचलण-मलण-निम्मद्दिया कीरति। उनके शरीर के तिल-तिल जितने छोटे-छोटे टुकड़े कर दिये जाते हैं, उन्हीं के शरीर में से काटे हुए और रुधिर से लिप्त मांस के छोटे-छोटे टुकड़े उन्हें खिलाए जाते हैं। कठोर एवं कर्कश स्पर्श वाले पत्थर आदि से उन्हें पीटा जाता है। इस भयावह दृश्य को देखने के लिए उत्कंठित नर-नारियों की भीड से वे घिर जाते हैं। नागरिकजन उन्हें इस अवस्था में देखते हैं, मृत्युदण्ड प्राप्त कैदी की पोशाक उन्हें पहनाई जाती है और उन्हें नगर के बीचों-बीच से होकर ले जाया जाता है उस समय वे चोर अत्यन्त दयनीय दिखाई देते हैं। त्राणरहित, अशरण, अनाथ, बन्धु-बान्धवविहीन, भाई बंधुओं द्वारा परित्यक्त वे इधर-उधर दिशाओं में नजर डालते हैं। और सामने उपस्थित मौत के भय से अत्यन्त घबराए हुए होते हैं। तत्पश्चात् उन्हें वधस्थल पर पहुंचा दिया जाता है और उन अभागों को शूली पर चढ़ा दिया जाता है, जिससे उनका शरीर चिर जाता है। वहां वध्यभूमि में उनके (किन्हीं-किन्हीं चोरों के) अंग-प्रत्यंग काट डाले जाते हैं-टुकड़े कर दिये जाते हैं। किसी किसी को वृक्ष की शाखाओं पर टांग दिया जाता है, दीनता से विलाप करते हुए उनके चार अंगों अर्थात् दोनों हाथों और दोनों पैरों को कस कर बांध दिया जाता है। किन्हीं को पर्वत की चोटी से नीचे गिरा दिया जाता है, बहुत ऊंचाई से गिराये जाने के कारण उन्हें विषम-नुकीले पत्थरों की चोट सहन करनी पड़ती है। किसी-किसी को हाथी के पैर के नीच कुचल कर कचूमर बना दिया जाता है। उन चोरी करने वालों को कुंठित धार वाले कुल्हाड़ों आदि से अठारह स्थानों में खण्डित किया जाता है। कईयों के कान, आंख और नाक काट दिये जाते हैं तथा नेत्र दांत और वृषण-अंडकोश उखाड़ लिये जाते हैं। जीभ खींच कर बाहर निकाल ली जाती है। कान काट लिए जाते हैं, शिराएं काट दी जाती हैं फिर उन्हें वधभूमि में ले जाया जाता है, वहां तलवार से काट दिया जाता है, किन्हीं-किन्हीं चोरों के हाथ और पैर काट कर निर्वासित कर दिया जाता है। कई चोरों को आजीवन-मृत्युपर्यन्त कारागार में रखा जाता है। दूसरे के द्रव्य का अपहरण करने में लब्ध कर्ड चोरों को कारागार में सांकल बांध कर एवं दोनों पैरों में बेड़ियां डाल कर बन्द कर दिया जाता है, कारागार में बन्दी बनाकर उनका धन छीन लिया जाता है। राजकीय भय के कारण कोई स्वजन उन चोरों से सम्बन्ध नहीं रखते, मित्रजन उनकी रक्षा नहीं करते.सभी के द्वारा वे तिरस्कत होते हैं, अतएव वे सभी ओर से निराश हो जाते हैं। बहुत से लोग "धिक्कार है तुम्हें" इस प्रकार कहते हैं तो वे लज्जित होते हैं अथवा अपनी काली करतूत के कारण अपने परिवार को लज्जित करते हैं, उन लज्जाहीन मनुष्यों को निरन्तर भूखा मरना पड़ता है, चोरी के वे अपराधी सर्दी गर्मी और प्यास की पीड़ा से कराहते-चिल्लाते रहते हैं, उनका चेहरा सहमा हुआ और क्रान्तिहीन हो जाता है। पावकारी अट्ठारसखंडिया य कीरंति मुंडपरसुहिं। केइ उक्कत्त कन्नोट्ठ-नासा उप्पाडिय-नयण-दसण-वसणा। जिब्भिंदियच्छिया। छिन्न कन्न सिरा पणिज्जते छिज्जते य असिणा निव्विसया छिन्न-हत्थ-पाया। पमुच्चंते य जावज्जीवबंधणा य कीरंति। केइ परदव्वहरणलुद्धा कारग्गल नियल-जुवल रुद्धा चारगाए हयसारा। सयणविप्पमुक्का मित्तजणनिरक्खिया निरासा बहुजणधिक्कारसद्दलज्जाविया अलज्जा अणुबद्धखुहा पारद्धा सीउण्ह-तण्ह-वेयण-दुग्घट्ट-घट्ठिया विवन्नमुह-विच्छविया,
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
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